दीप , दीप क्यूँ हैं ?

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मैं खडी़ की खडी़ रह गई और मेरे साथ वाले मुझ से कौसों आगे निकल गये । मुझ से बहुत पीछे वाले भी आगे बढ़ते रहे और मैं…… वहीं की वहीं ।
ना जाने जिन्दगी क्या चाहती थी । उस अन्धेरे से भरी जिन्दगी में कुछ साथ रुकने को तैयार नहीं … बस मैं और अन्धेरा और अन्धेरे में फ़ैला मेरा ही साया ।

उस अन्धेरे में मैनें एक घर बनाया बिल्कुल रोशनी से भरा हो जैसे….. बहुत वक्त उस घर को अपना समझा और हकीकत समझा…….. और एक दिन एक रोशनी कुछ पल को आई और बता गई कुछ भी नहीं हैं ।

जिन्दगी की एक अजीब सी उस बेबसी को १ साल तक बस देखा और देखती रही । ना कुछ किया जा सकता था ना कुछ किया ।

सुना करती थी कि एक लड़की हुआ करती मुझ जैसी बिल्कुल मुझ जैसी ……. बहुत खुश मिजाज हर समस्या का समाधान था उसके पास , उस के आस पास गम आता तो था पर खो जाता था । लेकिन जिन्दगी तो ना जाने क्या चाहती थी ।

उसी दौर में मैनें अन्धेरे में मिट्टी उठाई और एक दीप बनाया ………
फ़िर देखते ही देखते वो दीप जलने लगा ।
बस फ़िर क्या था सुबह शाम दिन रात उसी को देख देख कर वक्त निकाला ।
जिन्दगी में कुछ बदला नहीं था उस अन्धेरे में कोई आज भी नहीं रुकता पर वो दीप आज भी मेरे साथ हैं ।
मुझे बिखरने से बचाता है । मेरी बातें सुनता है । मुझ से बातें करता हैं ।

उस ने मुझे कई बार खोने से बचाया । मैं हालातों में जब अपने आप को भुलने लगती हूँ वो मुझे अपने आप से मिला जाता है ।

मुझ से कई बार पुछा गया हैं कि मैने अपना नाम दीप क्यूँ रखा हैं । इसका कारण यही है ।
मैने दीप को जिन्दगी के हर दौर में हर हाल में सिर्फ़ अपना काम करते देखा है । दीप ना कुछ कहता है ना सुनता है । बस अपना काम करता जाता है ।

मन्दिर में इबादत करता है । मातम में उम्मीद जलाये रखाता है । दीवाली में खुशाहाली , अन्धेरे में रोशनी , राह में सही रास्ता ।

वो दीप जो रोशनी का साथी तो हैं मगर साथ अन्धेरे का भी देता है । वो दीप जो सब को रोशनी बाटँता है मगर अपने दामन में अन्धेरे को पनाह देता है । वो दीप जो बाती को वो मुकाम देता है जहाँ उसका जीवन सफ़ल हो जाये ।

मैं वही दीप बनना चाहती हुँ । वो दीप जो मैनें अन्धेरे में बनाया था आज मेरी जिन्दगी हैं । उस दीप का नाम “लम्हे ज़िन्दगी के ” ।

और आज उस दीप को जलते हुऎ २ साल हो चले ।

मेरे शब्दो में वो ताकत नहीं जो उन ३ सालो को या पिछले 9 सालो को बयान कर सके …….. पर आज अगर मैं हुँ तो उसकी एक सबसे बडी वजह लम्हे जिन्दगी के है जिसने मुझे उस मुश्किल दौर से सम्भाला ।

और लम्हे जिन्दगी के आप सब की वजह से ….. आप सब पढ़ने वालों की वजह से हैं । आप सब अगर पढ़ते नहीं तो मैं इसे बरकार नहीं रखा पाती ।

इस लिये शुक्रिया आप सब का ।

सादर
हेम ज्योत्स्ना “दीप”

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2 साल- एक सफ़र

18 responses »

  1. अरे वाह!! इस दीप को जलते दो साल हो गये. बहुत बहुत बधाई. ऐसे ही यह बरसों बरस जलता रहे और चिट्ठाजगत को रोशन करता रहे, यही शुभकामनाऐं.

  2. मन्दिर में इबादत करता है । मातम में उम्मीद जलाये रखाता है । दीवाली में खुशाहाली , अन्धेरे में रोशनी , राह में सही रास्ता ।

    isi tarah aap bhi hamesha deep hi bane rehan aur apna yeh kaam – blog dwara ummeed ka sandesh – dete rehna

  3. दो वर्षों तक ‘दीप’ का प्रकाश सारे ब्लाग-जगत में फैलता रहा है। वैसे तो ‘दीप’ की ज्योति ११ वर्ष की आयु में ही जला दी थी। दो वर्षों में अनेक सुंदर रचनाएं पढ़ने को मिली हैं।
    ‘दीप’ की ज्योति इसी तरह साल दर साल ऐसे ही फैलती रहे। तुम्हारी ही कुछ पंक्तियां
    दे रहा हूं:
    दीप तू अब रोशन हो ,
    घनघोर अन्धेरे या ,
    जगंल सा बिहड़ मन हो ,
    दीप तू अब रोशन हो ।
    चिट्ठ जगत में दो वर्ष के सफलपूर्वक सफ़र पर बधाई।

  4. आपके ब्लॉग में बहुत कुछ पड़ने को है. आप् बहुत अच्छा लिखतीं हैं
    खासकर निम्न पंक्तियां बहुत ही अच्छी हैं.

    दीप तू अब रोशन हो ,
    घनघोर अन्धेरे या ,
    जगंल सा बिहड़ मन हो ,
    दीप तू अब रोशन हो ।

    धन्यवाद

    दीपक जलता रहे
    जिन्दगी रोशन होती रहे
    ये कारवां यू ही चलता रहे ……………….

  5. hi…wonderful blog…liked very much…. expressing our feelings in our own mother tongue is a great experience…which typing tool are you using for typing in Hindi…? recently i was searching for user friendly an Indian Language typing tool and found… ” quillpad “. do u use the same…? as per the voice of the industry, it is much more superior than the Google’s indic transliteration…!? anyway you try it out. http://www.quillpad.in

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    Jai…Ho….

  6. आपका दो-साला सफ़र के बारे में पढ़ा….थोडा-सा देखा भी….अब मैं अपने छोटे से मुहँ से क्या कहूँ कि आपका लेखन तो अच्छा है…..थोडा और और अच्छा हो जाए….तो आप छा जाएँ….सच….बेशक मैं तो पहली बार आया हूँ यहाँ…..और अब बार-बार भी तो आना होगा….जैसे सीढ़ी-दर-सीढ़ी हम ऊपर चढ़ते हैं….वैसे ही कुछ और-कुछ और बेहतर की कामना भी तो करते हैं….वैसी ही अपेक्षा मेरी आपसे भी है….!!

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