तुम वो बहर बनो

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मेरे ज़िन्दगी के सफर में तुम
मेरी चाह है हमसफ़र बनो
यही ख्वाब है मेरा एक
हर नजारा तुम हर नजर बनो |

जहाँ हो वफ़ा हर शाम में ,
जहाँ ज़िन्दगी हर जाम में ,
जहाँ चाँदनी हर रात हो ,
उम्मीद की हर सहर बनो |

मैं नहीं काबिल तेरे बना ,
तू फलक मैं गर्दिश भला !
तू पूनम , मैं मावस की रात ,
नही बने मेरे वास्ते मगर बनो |

नही मेरे लिखने में वजन कोई
नही साज पर कोई गीत चढा |
ना लिख सका कोई ग़ज़ल ,
गुनगुना सकूँ तुम वो बहर बनो |

मेरी नही पतवार कोई
मेरा नही माझी कोई
मैं हूँ तन्हा मंझधार में ,
कश्ती को दे किनारा वो लहर बनो |

13 responses »

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है
    लेकिन

    बरबस ही दुष्यंत कुमार का शेर याद आ गया

    वे सहारे भी नहीं और जंग लड़नी है तुझे
    आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख

  2. जहाँ हो वफ़ा हर शाम में ,
    जहाँ ज़िन्दगी हर जाम में ,
    जहाँ चाँदनी हर रात हो ,
    उम्मीद की हर सहर बनो |

    waah bahut sundar

  3. बहुत सुंदर नज़्म है।
    यह पंक्तियां बहुत पसंद आईं:
    नही मेरे लिखने में वजन कोई
    नही साज पर कोई गीत चढा |
    ना लिख सका कोई ग़ज़ल ,
    गुनगुना सकूँ तुम वो बहर बनो |
    महावीर शर्मा

  4. मेरी नहीं पतवार कोई , मेरा नहीं मांझी कोई
    मैं हूँ तनहा मझदार में , कश्ती को दे किनारा वो लहर बनो

    मन को छू लेने वाली अछि पंक्तियाँ
    रचना में कला पक्ष भी उजागर हो रहा है …
    बधाई स्वीकारें . . . . .
    —मुफलिस—

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