बापू का ख़त

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प्रिय देशवासियों ,

मैं यहाँ स्वर्ग में कुशल-मंगल हूँ आशा करता हूँ भारत में भी सब कुशल-मंगल ही होगा ।

इन दिनों सुभाष के कई शिष्ये ( शहीद ) आये और मंगल भगत भी वापस आने की तैयारी में लग रहे हैं  तो मुझे लगा देश में सब थीक तो है या नहीं ?

आज देखा तो पता लगा मेरे देश में तो सब मेरे सिध्दांत आँख बन्द कर के माने जा रहे । कोई एक शहर में धमाके करता हैं तो आप उसे दुसरे शहर को आगे कर देते हो । जयपुर के बाद दिल्ली फ़िर कोई और अब मुम्बई के बाद किस्से बरबाद करवाने वाले हो ?

मेरे नाम पर क्या अपनी बेबसी मजबूरी कमजोरी छुपा रहे हो ? ये तो नहीं था मेरे सिध्दांत । मेरे और मेरे साथियों के बलिदान का यही मतलब निकाला है आपने सबने । पर इस बार शायद में नहीं आउंगा और आ भी गया तो शायद आजाद ना करा पाउँ ।

मुझे माफ़ करो , अपनी नाकमी को अहिंसा नाम मत दो ।

आपका अपना ,

बापू

7 responses »

  1. बहुत बढ़िया ! हमने तो पहले ही ‘मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी’ अपना नारा बना रखा है । कमजोर की अहिंसा को अहिंसा नहीं कहा जाता मजबूरी कहा जाता है ।
    घुघूती बासूती

  2. अच्छा िलखा है आपने । जीवन के सच को प्रभावशाली तरीके से शब्दबद्ध िकया है । मैने अपने ब्लाग पर एक लेख िलखा है -आत्मिवश्वास के सहारे जीतें िजंदगी की जंग-समय हो तो पढें और कमेंट भी दें-

    http://www.ashokvichar.blogspot.com

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