आफतों का शहर

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आफतों का ये शहर ,
रन्जिश है हवाऒं में ,
गुलशनों में भी सिर्फ धोखे है ,
फ़ुल दिखता है जो ,
पत्थर सी चोट देता है ।
राहे अपनी सी लगती हैं ,
मन्जिलें अपनी है कहाँ ।
मन्दिरों-मस्जिदों में भी जाकर देखा ,
कारोबार है सब ,धर्म दर्द बहुत देता है ।
कई चाँद सूरज है ,
फ़िर भी सुकून की रोशनी नहीं ,
भीड़ अपनों सी है मगर ,
जख्म गहरा अपना ही देता हैं ।

7 responses »

  1. बहुत अच्छी रचना है आपकी । भाव की प्रखर अिभव्यिक्त है । मैने अपने ब्लाग पर एक लेख- उदूॆ की जमीन से फूटी िहंदी गजल की काव्यधारा- िलखा हैं । समय हो तो पढें और प्रितकिर्या भी दें –

    http://www.ashokvichar.blogspot.com

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