कुछ कागज़ थे अज़ीज़

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कुछ कागज़ थे अज़ीज़ जलाये हमने ,

कुछ साल पुराने, कुछ पल में बिताये हमने ,

हर लम्हा कड़ी की तरह जुड़ता जाता था ,

सैलाब सभी मन के अलफाजो से तो छलके ,

मगर आँखों से छिपाये हमने ।

कुछ धूआँ सा हुआ , कुछ निशाँ से बचे ,

जो सम्भाले थे सुखे अश्क ,

मोती बताके जहाँ को दिखाये हमने ।

अभी कल ही मिले थे वो जो अब कहीं नहीं है ,

अफसाने उनके ,खुदी बहुत सुनाये हमने ,

ज़िन्दगी के रिश्ते तो निभा ना सके ,

रिश्ते खुदा से बहुत खूब निभाये हमने ,

वो खाक हुए साल , वो लम्हे ,

तिनके की तरह हवा में उडाये हमने ।

8 responses »

  1. ज़िन्दगी के रिश्ते तो निभा ना सके ,
    रिश्ते खुदा से बहुत खूब निभाये हमने ,
    वो खाक हुए साल , वो लम्हे ,
    तिनके की तरह हवा में उडाये हमने ।
    सुंदर अभिव्यक्ति . बधाई .

  2. अभी कल ही मिले थे वो जो अब कहीं नहीं है ,

    अफसाने उनके ,खुदी बहुत सुनाये हमने ,

    ज़िन्दगी के रिश्ते तो निभा ना सके ,

    रिश्ते खुदा से बहुत खूब निभाये हमने ,

    वो खाक हुए साल , वो लम्हे ,

    तिनके की तरह हवा में उडाये हमने ।
    sach ye akhari lines kahi apne hi dil ke karib si lagti hai,shayad humne bhi aisa hi kiya tha college khatam hone ke kuch saal baad.na purane doston ke khat greetings fade jate na sambhale jate aur har tasveer ankhon ke samne se sarakti.bahut hi sundar kavita ek dam aapke juda andaaz mein.bahut dino baad aapka aana achha laga,ab kaam se fursat mili agta hai thodi,yuhi kalam chalati rahe,kuch kaaal aapke padhne ko taraste hai yaha:)

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