लो अब उठता हूँ , लो अब जाऊँ

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कुछ कर्ज लिये थे दे जाऊँ ,

कुछ अश्क मिले थे पी जाऊँ ,

मैंने भी पाया ज़ख्म यहाँ पर ,

औरों को भी कुछ दे जाऊँ ,

ना लाया था कुछ , ना ले जाऊँ ,

लो अब उठता हूँ , लो अब जाऊँ ,

इस मोह से बन्धन टुटा पर ,

इस माया से कैसे मुक्ति पाऊँ ?

सागर से बिछडा़ दरिया हूँ ,

काश कहीं पर फ़िर मिल जाऊँ ,

बादल ने चुराया जिस धरा का पानी ,

उस धरा को आज भिगो जाऊँ ।

ना लाया था कुछ , ना ले जाऊँ ,

लो अब उठता हूँ , लो अब जाऊँ ,

इस मोह से बन्धन टुटा पर ,

इस माया से कैसे मुक्ति पाऊँ ?

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