मुसीबतें हमें पाल लेती है

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कलम जब जब रोती है ,
शब्दों की शक्ल लेती है ।

अश्कों की स्याही , अश्को की स्याही ,
किताब के दामन में सोती है ।

जख्म लगाती है इक हाथ से ,
दुजे से जिन्दगी मरहम देती है ।

बिखर जाता हूँ तेरी कमी में ,
तेरी यादें मुझे थाम लेती है ।

रात चढ़ती है सहर बनने को ,
स्याह स्याही खूनी आंचल दाल लेती है ।

यूँ तो दवा दारू नहीं करते हैं हमसफर
लेकिन मुसीबतें हमें पाल लेती है ।

बरसों की दुरियाँ हैं बाकी ,तेरी निगाहें
मेरी हसीं का धोखा जान लेती है ।

चल दीप के महफ़िल में तेरा काम क्या ?
यहाँ की रंगीनियां अन्धेरो से काम लेती है ।

7 responses »

  1. यूँ तो दवा दारू नहीं करते हैं हमसफर
    लेकिन मुसीबतें हमें पाल लेती है ।

    बरसों की दुरियाँ हैं बाकी ,तेरी निगाहें
    मेरी हसीं का धोखा जान लेती है ।

    चल दीप के महफ़िल में तेरा काम क्या ?
    यहाँ की रंगीनियां अन्धेरो से काम लेती है ।

    kya baat hai
    bahut khoob

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