मुस्कान पहन कर देख ज़रा

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अश्कों के वस्त्रों को त्याग ,

मुस्कान पहन कर देख ज़रा।

दर्द के सायों में ,

कांटों के हारों में ,

धुमिल जस्बातों में ,

यादों की सौगातों में ,

अश्कों के वस्त्रों को त्याग ,

मुस्कान पहन कर देख ज़रा।

ज़ख्मी हालातों में ,

तन्हाई के सवालातों में ,

रुखसत की उन रातों में ,

ख्वाबों के बिखरे टुकडों में ,

अश्कों के वस्त्रों को त्याग ,

मुस्कान पहन कर देख ज़रा।

टुटे कस्में-वादों में ,

गर्दिश के नजारों में ,

पतझड़ की सी बहारों में ,

टुटे हुऎ सहारों में ,

अश्कों के वस्त्रों को त्याग ,

मुस्कान पहन कर देख ज़रा।

10 responses »

  1. ज़ख्मी हालातों में ,

    तन्हाई के सवालातों में ,

    रुखसत की उन रातों में ,

    ख्वाबों के बिखरे टुकडों में ,

    अश्कों के वस्त्रों को त्याग ,

    मुस्कान पहन कर देख ज़रा।
    hem ji bahut bahut khubsurat,zindagi ke har dukh dariya mein ashq to beh jate hai,unhe kuch pal baad tyag kar muskan ka pehnava chadha lena chahiye,ek sundar sa sandesa deti sundar si kavita ke liye badhai,bahut hi aashavadi hai.

  2. ज़िंदगी का पॉज़िटिव नज़रिया दिया है जिसकी आज के युग में
    बहुत ही ज़रूरत है। वाह! स्वयं ही मुंह से निकलता है। बहुत सुंदर।

  3. कठिन परिस्थिति में धैर्य, साहस, व आशावाद हमें प्रकाश की ओर ले जाता है। यह सब हम मुस्कराते हुए जी लें यही इस कविता का संदेश है। उत्तम!

  4. समाईली डालना आसान है पर बहुत मुश्किल है मुस्कान पहनना, जब अंदर दुख का दरिया हो ।
    फिर भी कोशिश करूँगा जब एसी कविता पढी हो तो…

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