कुछ ना मिला

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इतने बडे अम्बर को हमने छू कर देखा कुछ ना मिला ,
दर्द भरे इस दिल में हमको गम के सिवा कुछ ना मिला ,
रोशनी भी चांद के हैं पास कहाँ ,वो तो मांगे सूरज से ,
सूरज बोला मेरे हाथ  भी , राख के सिवा कुछ ना मिला ।
कहते हैं जीवन को खेल धूप-छांव का ,
ऎसे भी इन्सान मिलें है , जिन्हे छाव भरा एक पल ना मिला ।

7 responses »

  1. “ऎसे भी इन्सान मिलें है , जिन्हे छाव भरा एक पल ना मिला ।”
    Ji han shayad yahi jindagi hai. Par ek katra bhi chhavan ka kisi ko koi de sake to jindagi ki ye badi khushi hogi

  2. सुन्दर भावपूर्ण रचना है।

    ोशनी भी चांद के हैं पास कहाँ ,वो तो मांगे सूरज से ,
    सूरज बोला मेरे हाथ भी , राख के सिवा कुछ ना मिला ।

  3. कहते हैं जीवन को खेल धूप-छांव का ,
    ऎसे भी इन्सान मिलें है , जिन्हे छाव भरा एक पल ना मिला ।
    bahut gehri baat bahut sundar

  4. hello sir,
    really your poem is very fantastic. I read it. I like it. I want to contact you .Please give me your no. Beacause i like such type of poems. my no. is 09466778357 or send me mail on my email address.
    thanks:
    awaiting of your ans.

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