उडती तितली की तरह

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उदास रात की कोई सुबह हसीन नहीं ।
नहीं आँसमां मेरा ,मॆरी कहीं ज़मीन नहीं ।

मैं खूशबू बन के हवा में नहीं बसती ,
मैं कोई किरणों की तरह भी महीन नहीं ।

मुझे ख्वाबों में मत तराश अभी ,
उडती तितली की तरह, मैं कोई रंगीन नहीं ।

छुप जाते हैं कभी-कभी , चाँद-तारे भी,
मेरा कत्ल ही हैं , ये गुनाह कोई संगीन नही ।

दफ़न कर या जला दे अब मुझको ,
ज़िस्म में रूह नहीं ,अब कोई तौहीन नहीं ।

भूला बैठा है , वो वेवफ़ा मुझको ,
मिला कहीं तो पह्चाने, इसका भी यकीन नहीं ।

बुझ गया ये “दीप” ,सुबह के सितारे के लिये ,
खुश हूँ मिट कर भी , मैं कोई गमगीन नहीं ।

21 responses »

  1. दफ़न कर या जला दे अब मुझको ,
    ज़िस्म में रूह नहीं ,अब कोई तौहीन नहीं ।

    भूला बैठा है , वो वेवफ़ा मुझको ,
    मिला कहीं तो पह्चाने, इसका भी यकीन नहीं ।

    awesome hem ji,aapke lekhani ke deep yuhi jalte rahein hamesha,na koi tara na sitara bujha sake.

  2. दीप जी आप के ख्याल को पढ़ ये शेर बन पड़ है तवज्जो चाहूंगा,

    तौहीन क्या और कद्र कैसी, फकीराना तबियत अपनी
    रोजाना खाबों में ले कर निकलतें हैं हम मइयत अपनी

  3. ‘उड़ती तितली की तरह’ वैसे तो सारी ही रचना बार बार पढ़ने लायक है, फिर
    भी यह शेर बहुत पसंद आयाः
    दफ़्न कर या जला दे अब मुझको,
    जिस्म में रूह नहीं, अब कोई तौहीन नहीं।

  4. Namastey,

    kya khoob likha hai aapne
    man-aandit hogya

    मैं खूशबू बन के हवा में नहीं बसती ,
    मैं कोई किरणों की तरह भी महीन नहीं ।

    मुझे ख्वाबों में मत तराश अभी ,
    उडती तितली की तरह, मैं कोई रंगीन नहीं ।

    waaaaaaaaaaaaaaaaaaah

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