कविता हूँ मैं

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हंसी खुशी ,रिश्ते नाते ,एहसास दोस्ती से मिल कर बनी कविता हूँ मैं ,

जो अपनी होकर भी , बुरी लगे , एक ऎसी ही अजीब दुविधा हूँ मैं ,

अशोक के गर्म खून सी, बौध्द शान्ति में पली , गुमनाम संगमित्रा हूँ मैं ,

शब्द से निर्मित हूँ , शब्द अन्त है मेरा ,

मुक्त छोड दो तो खो जाती हूँ , हर बार बाधंनी जो पडे , एक ऎसी भुमिका हुँ मैं ।

हुनर जिसका भीड में नजर आता है , वो एक छोटी सी कणिका हूँ मैं ।

जिसके दामन में अश्क गिर के सोते है ,शायद ऎसी एक अंकिता हूँ मैं ।

जिन्दगी के  रंगो से भरी , जख्मो से हर बार सजी ,

खुद से मिल खुद खो जाने वाली  , एक अनजान चित्रा हूँ मैं ।

10 responses »

  1. ऐसा लगता हैं मानों कवियित्री ने समय के समानांतर यात्रा की हो | इतिहास, संस्कृति और संवेदनाओ को चंद पंक्तियों में बहुत खूब व्यक्त किया हैं |यही कविता का सही मर्म हैं |

  2. bahut sundar hai hem ji,har shabdh jaise khud ko pehchankar bhi anjana sa lagat hai,
    अशोक के गर्म खून सी, बौध्द शान्ति में पली , गुमनाम संगमित्रा हूँ मैं ,
    this is fantastic.
    mitkar bhi na jo mit payi,aisi hi asmita hun mai.

  3. “जिन्दगी के रंगो से भरी , जख्मो से हर बार सजी , खुद से मिल खुद खो जाने वाली , एक अनजान चित्रा हूँ मैं ।”
    बहुत ही प्यारी पंक्तियाँ हैं , हेम |

  4. ‘कविता हूँ मैं’ में यह पंक्तियां बहुत ही अच्छी लगीं :-
    शब्द से निर्मित हूँ, शब्द अन्त है मेरा
    मुक्त छोड़ दो तो खो जाती हूँ,

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