बुढ़ापा

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आँगन की तपती दोपहरी में ,
खाट के जैसे तपता सा
अपनो के चेहरो में ही ,
अपनो की राहें तकता सा |

चेहरे की झुर्री में
मुस्कान कहीं गुम हो जाती ,
तन्हाई में यादों की ,
बातें पुरानी रटता सा |

इस गली से उस मोड़ तक
नज़रे जा-जा कर आती ,
हाथ में लाठी ,बैठ बगीचे में ,
सुख-दुख के पंखे झलता सा |

अपने ही क़िस्सों की कहानी
बुन-बुन कर ,सबको सुनता ,
देख चुका जीवन के सब रंग ,
बन बैठा अब पतझड़ सा |

चकाचोंध से घर में दिवाली
होती है अक्सर अब तो ,
बेबसी में बेवजह ,बाम पे रखा ,
“दीप” कोई हैं जलता सा |

meri nanijee ko meri taraf se ye kavitaanjali

12 responses »

  1. हमारे बुजर्ग अपने समय के जीवंत हस्ताक्षर होते है पर अक्सर लोग उनकी बीती हुई जिंदगी और उनकीं आंखों में देखे गए सपनों को समझ नहीं पाते या फिर भूल से जाते है सबकुछ जानते हुए भी।

    आपकी कविता में आपकीं संवेदना आपकी नानी के लिए देखकर खुशी हुई ।कवि होना ही संवेदनाशीलता की सबसे बड़ी निशानी है। लिखती रहो जिंदगी खुद एक कविता है इससे ज्यादा और क्या लिखूं ।

    एक पत्रकार ,

  2. हेम जी
    सादर नमस्कार
    आप की रचना अभी पढी
    और इसको मैं अपना दुर्भाग्य ही कहूँगा की इतनी प्यारी रचना को इतने विलम्भ से पढ़ पाया
    आप की सशक्त लेखनी को बहुत बहुत साधुबाद
    मार्मिकता का सजीव चित्रण करने में आप सफल रही हैं
    आशा करता हूँ की इस प्रकार की रचनाये हमें आगे भी पढ़ने को मिलती रहेंगी
    शुभकामनाओं सहित
    विपिन चौहान “मन”

  3. bahut khub likhti hai aap
    Aaise main jyada kavitayen padhta to nain par agar kabhi padh bhi leta hoon to aalasya k mare kabhi comment nahi karta. Par aap ki lekhni me vo baat kahin na kahin chhuppi hai jo mujhe yahan tippaddi karne k liye majboor kar di .

    aise to jivan k rango ko har koi apne najar se dekhta hai par ek likhne wala shayad apni ek zindagi me he bahut sari aur bhi jindagiya jita hai .kabhi apne seene me dard rakh k auro ki khushi likhna to kabhi apni khushi k beech me doosro k aasoovo ko panno pe utarna, shayad yahi vo cheeze hoti hai jo ek kavi ya lekhak ko baki logo se ekdum alag khada kar deti hai.

    mujhe asha hai ki aap aise he achhi kavitao se logo aur samaj ka utthan karengi.
    dhanyavad

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