बिछुड़ ने की कोई रस्म नहीं होती

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तुझ से मिलने की ख़्वाहिश मेरी कभी कम नहीं होती 
मेरे हाथों की लकीरों से  , मेरी लड़ाई ख़त्म नही होती 

यूँ तो रोशन है दिल का कौना कौना तुझसे ,
कभी तो  , के तेरे बीन मेरे घर में रोशनी नहीं होती 

तुझे तो मिलना है मुझ से मेरे साथ जीना है ,
ये अलग बात के  ,खुदा से मेरी जंग ख़त्म नहीं होती ,

यहाँ के दरोदीवार भी ख़फा रहते है मुझ से ,
ख़ुशबू –नज़रों की  भी शिकायत कम नहीं होती ,

आ मेरे पास कभी यूँ गुन-गुनाता रहूँ तुझ को ,
मेरे ज़ुबान पर तेरी तारीफ़े  , कभी ख़त्म नहीं होती

हम जो मिलेगे , ना बिछहड़ेगे कभी फिर से ,
मिलने के बाद , बिछुड़ ने की कोई रस्म नहीं होती ,

मैने ये कब कहा के तू मेरी साँसे धड़कन ज़िंदगी है ,
मगर तेरे बिन ये मेरी ज़िंदगी , ज़िंदगी नहीं होती 

15 responses »

  1. कभी कभी कहीं भी लिखीं कतरें कितनी अपनी लगती हैं अभी अभी ब्लॉगवाणी पर गया तो आप सबसे ऊपर विराजीं थीं. अपनी कविता की तरह. यह सबसे खूबसूरत शायरी है. अहसास की शायरी. इंसानी जज्बात की गहराई की शायरी. सारी की सारी गजलों का कथ्य अपने करीब का जीवन बताता है. यह ड्राइंगरूप के अकेलेपन का चित्र नहीं वरन किसी झरने के पास बैठकर शिद्धत से किसी को याद करने की सिंफनी है. बहुत खूब. हम आपके मुरीद हुए

  2. वाह,किसी का ख्याल आ गया,जो रोज़ यही बात दोहराते हैं…बहुत खूब

    हम जो मिलेगे , ना बिछहड़ेगे कभी फिर से ,
    मिलने के बाद , बिछुड़ ने की कोई रस्म नहीं होती ,

  3. हाथ की लकीरें कुछ नहीं होतीं। बस अपने में डूबे रहने का बहाना है। वैसे, शायरी जबरदस्त है।
    मैने ये कब कहा कि तू मेरी साँसे धड़कन ज़िंदगी है,
    मगर तेरे बिन ये मेरी ज़िंदगी, ज़िंदगी नहीं होती।।

  4. ज्योत्सना जी,
    सच कहा आपने ’बिछुडने की कोई रस्म नहीं होती’.आपकी गजल पढते हुए मुझे भी एक शेर की कुछ पंक्तियां याद आ गय़ीं-
    ’जो पूछा यार से मॆंने,तूझे किसी से मॊहब्बत हॆ
    तो यो लगा हंसकर के कहने बस तुम्हीं पर दम निकलता हॆ.’

  5. “bina kisi prarna ke kavi ki kavita puri nahi hoti”

    “lakh dhundlo dusro ki aankhon main khudko, per darpan ke bina ask ki tlash puri nahi hoti”

    Its for Hem-
    “is jmane main bhi log gr yoon alfajo se khela karte, to aap jaise kaviyon ki kamin nahi hoti”

  6. ज्योत्सना जी
    आज आप के ब्लॉग पर पहली बार आया हूँ.
    आप के पास बहुत अच्छे भाव हैं शब्द हैं लेकिन उनको ठीक से पिरोने कि कला नहीं है. ग़ज़ल के नाम पर यूँ तो बहुत प्रयोग हुए हैं लेकिन ग़ज़ल में काफिये और बहर का होना लाज़मी है.आप कोशिश करिये ये इतना मुश्किल नहीं जितना लगता है. शुरू में मुझे भी समझ नहीं आया था कुछ लेकिन धीरे धीरे सीख रहा हूँ.ये सब आने के बाद देखिये कैसा आप का लिखा निखार पे आता है. आशा है मेरी बात को आप अन्यथा नहीं लेंगी.
    नीरज

  7. The comments above at s.no6 by Stuti ji mentions the word ‘alfajo’. The correct word is ‘alfaaz’ which is already a plural of ‘lafz’–so we don’t need to use the word ‘alfajo’. In my opinion use of words need a great deal of accuracy in general writing and poetry as well. A ‘Shayar’ looks upon the beautifully selected words in the same way as a lover looks upon his or her beloved. Only then a great ‘shayari’ comes out. What is your opinion jyotsna ji ?

  8. पिंगबैक: कुछ साल ज़िन्दगी के « Kreative Hunting in a Synthetic World…

  9. It’s an amazing poem viz. ‘BICHCHADNE KI KOI RASAM……….’, it touched me to the deepest of my heart. Keep going on like that. The comments being received by you are dominantly appreciable in your favour, but first pay attention to the critics, they r d really promoters, if you shall accept their thoughts in positive manners – Sahdev Jain

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