मेरी कविता बोली मुझसे..

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kavita

मेरी कविता बोली मुझसे ,
ओ-निर्माता मेरे ,मुझको ,
ये उम्मीद ना थी तुझसे ,

तुम जब मुझको नए नए शब्दों से सजा रहे थे,
मेरी गहराई कितनी है मुझ को ही बता रहे थे ,

अपने एह्सासो के बल पर ,  तुमने मुझको नए नए रुप दिये ,
सुन्दर सुन्दर स्वप्नों से अब तक ना जाने कितने स्वरुप दिये ,

माना निर्जीव को जान से ज्यादा जान दी तुमने ,
अभिमान से ज्यादा स्वाभिमान दिया तुमने ,

फिर क्युँ ऎसा करते हो  तुम ,
कई जख्म मुझे दें बैठॆ हो तुम ,

फिर भी अब तक खामोश रही ,
 लेकिन बस अब और नहीं ,

माफ किया आज भी तुमको ,
पर फिर ना ऎसा दोहराना ,

रखना मेरे स्वाभिमान का मान ,
कम ना करना अब मेरी जान ,

फिर से तमाशा महफिल में मुझे ना बनाना ,
जो ना समझें उन्हे नही  तुम मुझे सुनाना ,

17 responses »

  1. नमस्कार ,
    आप सभी की प्रतिक्रिया पढ कर और लिखने की प्रेरणा मिलती है ,
    धन्यवाद

    Manish jee ,
    ये मेरी ही खामी है कि मैं अपनी बात ठीक से नही रख पाई , परन्तु एक और प्रयास करती हूँ .
    कविता को जख्म तब मिलते है जब उसे किसी ऎसे को सुनाया जाये जो उस कविता की कद्र नहीं करके , कोई गलत टिप्पणी कर दे तब कविता का मान कम होता है और उसे जख्म मिलता है.
    ऎसा मेरा सोचना है , जिसके साथ मैने ये पंक्ति लिखी ,

    उम्मीद है आप सभी का सहयोग आगे भी मिलता रहेगा ,
    सादर
    हेम ज्योत्स्ना ’दीप’

  2. बहुत सुंदर और अच्छी कविता लिखी आपने. पढ़ कर बहुत ही अच्छा लगा. सुंदर शब्द चित्रण और सुंदर अभिव्यक्ति.

  3. आदाब

    बहुत ही अच्छी रचना है. दरअस्ल कविता पढ़ के …. Ok I’ll एक्सप्रेस it in English : There’s more to it than what meets the eyes. मैं blogging की दुनियाँ में अभी अभी आया हूँ. पहली बार पढ़ा आप को. अच्छा लगा. लिखती रहें. अच्छी रचना के लिए बधाई.

    मीत

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