कत्लें आम किया

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क्यूँ ज़ुबान छीनी मेरी , क्यूँ मुझे बेज़ुबान किया ।
मैंने कब तेरी बेवफ़ाई का चर्चा खुलेआम किया ।

ये माना के मैं निभा ना सका रस्म-ए-उल्फत ,
तुने भी कहाँ – कब , वफ़ा का कोई काम किया ।

इसी से बहल जायेगा दिल नादां ही तो है ,
तेरी गली में करके सज़दे हमने बहुत नाम किया ।

परदे में रखा है तेरा नाम साये को भी खबर नहीं ,
तुने ही बदनाम मुझे , बेवजह सर-ए-आम किया ।

सभी ने लगाये इल्ज़ाम मेरी बेगुनाई पर बहुत ,
कहा तुने भी, दीप ने परवानो का कत्लें आम किया ।

10 responses »

  1. हेम ज्योत्सना जी,

    बहुत सुन्दर ग़ज़ल पेश की है आपने….. बधाई …लेकिन एक सुझाव है अन्यथा न लें…जरा वर्तनी पर ध्यान दें….वैसे लिखती बहुत अच्छा हो…ये पंक्तिया बहुत अच्छी लगीं…पुन: बधाई…
    परदे में रखा है तेरा नाम साये को भी खबर नहीं ,
    तुने ही बदनाम मुझे , बेवजह सर-ए-आम किया ।

    डा. रमा द्विवेदी

  2. Hem

    परदे में रखा है तेरा नाम साये को भी खबर नहीं ,
    तुने ही बदनाम मुझे , बेवजह सर-ए-आम किया ।

    Sunder vichaar, sunder abhivyakti.
    Ramaji ki baat mein bhi dam hai.

    Daad ke saath

    Devi

  3. hello hem
    सभी ने लगाये इल्ज़ाम मेरी बेगुनाई पर बहुत ,
    कहा तुने भी, दीप ने परवानो का कत्लें आम किया ।
    deep per hi aksar ilzaam lagte hai….woh katal kare hai to charcha bhi nahi hoti, hum aah bhi bharte hai to gunnah hai..kuch aisha hi galib ne kaha tha….
    apni dil ki bhawano ka acha khyal rakthi he aap..words bhi thhek hai….likhte rahie
    rohit

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