खिज़ां को बुलाने चलो

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हर फ्रिक्र-ए-ज़हां को दिल से भुलाने चलो ।
चलो ख़्वाब में सूकून की  नींद सोने चलो ।

खिज़ा में भी रंगो को याद रखना सदा ,
मौसम-ए-ग़म में भी , खुशी को पाने चलो ।

राहतों के शहर की तलाश में मर ना जाना ,
आफतों के जहां  में ही , घर बसाने चलो ।

खिज़ा के बिन बहार कब आती है भला ,
बहार ना आये , तो खिज़ा को बुलाने चलो ।

ख़्वाहिश हो गर बुलन्द आंसमां छुने की ,
बादलो पर उड़ो , हवाओं को रिझाने  चलो ।

मौसम-ए-तन्हाई में , ये दीप जलता रहे सदा,
यादों की रोशनी से , महफिल सजाने चलो ।

14 responses »

  1. डा. रमा द्विवेदी said…

    गज़ल अच्छी है पर ’खीजां’ नहीं ’खिज़ा’ होता है…कई और भी वर्तनी की गलतियां हैं…जरा फिर से देख लें…कृपया अन्यथा न लें…..

    ये पंक्तियां बहुत भा गई……..
    ख़्वाहिश हो गर बुलन्द आंसमां छुने की ,
    बादलो पर उड़ो , हवाओं को रिझाने चलो ।

  2. I think this shayari is the beautiful extension of the Sanskrit Shloka- “TAMASOMAJYOTIRGAMAYAM”…….very inspiring. Your shayari always contain an element of MYSTERY which always make them even more thought provoking. Do you agree? I always keep forwarding your kavitayen to my friends so that they can also enjoy them.

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