खुदा से मिलने की ज़िद कर बैठा …….

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पत्थर तराशता एक शक्स , खुदा से मिलने की ज़िद कर बैठा ।
हाथ लकीरों से भरे थे पहले , अब मगर छालो से भर बैठा ।

मोम की तरह पत्थर भी अगर पिघल जाते ,
हर किसी को जहाँ में खुदा फिर मिल जाते ,
ढूँढ ने जो चला , जिन्दगी को मैं , जिन्दगी से ही हाथ धो बैठा ।
हाथ लकीरों से भरे थे पहले , अब मगर छालो से भर बैठा ।

जब खुशियाँ थी , तो पास कितने चेहरे थे ,
हमको लगता था, उनसे रिश्ते कितने गैहरे थे ,
दो घड़ी क्या मिला मैं ग़म से , साथी पुराने सभी मैं खो बैठा ।
हाथ लकीरों से भरे थे पहले , अब मगर छालो से भर बैठा ।

खूशबू सी आरही थी , जिन्दगी के गुलशन से ,
रोशन था हर नज़ारा , महके हुऐ चमन से ,
मुस्कुराते-मुस्कुराते क्या हुआ ,बस यूँ ही अचानक मैं रो बैठा ।
पत्थर तराशता एक शक्स , खुदा से मिलने की ज़िद कर बैठा ।

थक गया मैं देख-देख कर गुनाह होते हुऐ ,
देखता हुँ मैं , खुद को भी तबाह होते हुऐ ,
घर से निकला बदलने दस्तुरे-जहाँ, घर का पता ही मैं खो बैठा ।
पत्थर तराशता एक शक्स , खुदा से मिलने की ज़िद कर बैठा ।

बड़ी प्यारी थी जिन्दगी , जिन्दगी के बिना ,
बेवजह समझने चला जीवन को दर्द के बिना ,
हँसते मुस्कुराते चेहरे को ,अचानक अश्क के दागो से भर बैठा ।
पत्थर तराशता एक शक्स , खुदा से मिलने की ज़िद कर बैठा ।

पत्थर तराशता एक शक्स , खुदा से मिलने की ज़िद कर बैठा ।
हाथ लकीरों से भरे थे पहले , अब मगर छालो से भर बैठा ।

23 responses »

  1. हेम,

    बेहद संवेदनशील पंक्तियाँ हैं । संघर्ष के इन दिनों का भाव-प्रकाश सुंदर है । मेरी तरफ से कुछ पंक्तियाँ –

    साहस भर ‘दीप’, सबकी हथेली पर हैं – अनजानी आड़ी-तिरछी लकीर,
    तराशता रह तू , इन्हीं छालों से बदलेगी तेरी लकीर, और तेरी तकदीर ।

    कोई पत्थर को ही पूजता, तो दूसरा तराशकर पत्थर, मुर्ति बनाता ।
    खुदा के प्यारे है यहाँ दोनों बंदे, पर दूसरा यहाँ मुर्तिकार कहलाता ।

  2. कोई पत्थर को ही पूजता, तो दूसरा तराशकर पत्थर, मुर्ति बनाता ।
    खुदा के प्यारे है यहाँ दोनों बंदे, पर दूसरा यहाँ मुर्तिकार कहलाता

  3. Kavita me dekhta hu kuch aaz ke drishya, simat rahe rishte, swarth aur vivashta, man hai ki manta nahi,koi bura bhi kare/chala jaye to bhi ummid hai ki dua dene prerit karti hai.

    Manushya ka jivan aasha aur aane ki aas me hi jindgi nikal deta hai. Aap ki kavita bahut achi lagi, likhta me bhi hu thoda bahut lekin aap jesa nahi.

    Dhanyawad sahit

    girish

  4. Hello Ma’am… mei aapse kabhi mila toh nai… par itna jaroor janta hu ki u deserve ki puri dunia aapki poems pade…. sach main,, dil ko chhoo lene wale shabd likhe hain aapne,……. wish u all d best…. and carry on with ur talent….
    God bless u…

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