ये शहर मेरा………

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ये शहर मेरा धूप सा रंग बदलता ही रहा ।
कभी खुल के मिलते थे लोग यहाँ ,
अब मगर खुद से मिलने का भी वक्त कहाँ ,

ये शहर मेरा धूप सा रंग बदलता ही रहा ।
कभी बेज़ुबान पत्थर भी बात करते थे ,
अब मगर दोस्त भी अजनबी लगते है ,

ये शहर मेरा धूप सा रंग बदलता ही रहा ।
कभी खिला करता था बचपन की तरह ,
अब मगर बिखर गया है दरपन की तरह ,

ये शहर मेरा धूप सा रंग बदलता ही रहा ।
कभी बहारों का आशियाँ हुआ करता था ये ,
अब मगर पतझड़ के पेड़ सा लगता है ये ,

ये शहर मेरा धूप सा रंग बदलता ही रहा ।
कभी साथ रहते थे सब ,अकेला ना था कोई ,
अब मगर गये वक्त सा लौटा ही नहीं कोई ,

ये शहर मेरा धूप सा रंग बदलता ही रहा ।
कभी होता था , जो होता था कभी ,
अब मगर इसे एक नया रगं देना है ,

ये शहर मेरा धूप सा रंग बदलता ही रहा ।
आसमाँ भी वहीं है , हवा का ढ़गं भी वहीं है ,
बदलना है तो बस शहर के बाशिन्दो को ,

ये शहर मेरा धूप सा रंग बदलता ही रहा ।
इसके जर्रों में फिर जिन्दगी को भरना है ,
इसको एक कल के साथ आज देना है ,

ये शहर मेरा धूप सा रंग बदलता ही रहा ।
पाया-खोया , अच्छा-बुरा जैसा भी ,
मेरा शहर मेरा है चाहे हो जैसा भी ।

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