दीवाने का घर……..

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चन्द दीवारें बनी अधूरी सी ,

छत बनते बनते रह गई ।
कुछ अधुरी उम्मीदें मेरी ,

मेरे अधुरे घर की कहानी कह गई ।
जल रहे है ख्वाब कुछ ,

और हवा सगं इनको उड़ा ले गई ।
कुछ तस्वीरें सजी थी , उनको भी,

वक्त की बारिश बहा कर ले गई ।
तारीफ तो करनी होगी ,

दरारों से भरी दीवारों की ,
जिन्दगी की आधीं ये ,

तन्हाई से सह गई ।
धूप के कुछ थपेड़ो से जैसे फिर जीनें लगी ,
यादों की छांव फिर चलने लगी रुकने लगी ।
सहर आयेगी नई फिर ,

जाते जाते रात में याद तेरी कह गई ।
इसे खण्ड़र कहता है कोई ,

 तो कोई दीवाने का घर ,
कोई पागलखाना कहे ,

कोई अफसानो का घर ,
चन्द लम्हें जो बचे है ,

यही गुजरे तो बहत्तर हैं ।
जो भी है, जैसा भी है,

अधुरा ही सही मेरा घर है ।

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