मन विजय करने चला…..

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हो चुका होना जो भी , हो चुका ,
मिल चुका मिलना था जो भी मिल चुका ,
हारता ही रहा मैं , अब मगर ,
मन विजय करने चला ।

वक़्त की ठोकर लगी हैं ,
रह गया पीछे बहुत मैं ,
थक गया मैं भी बहुत पर ,
वक़्त के संग मैं भी चला ,
मन विजय करने चला ।

पहचानना मुश्किल हैं ,
क्या सही और क्या गलत ,
पथ नया, साथी नये, मैं वही पर ,
हाँ छुपा के खुद को खुद मै ,
हाँ दबा के खुद को खुद मैं ,
दस्तुरे जहाँ के संग चला ।
मन विजय करने चला ।

उठ रहा हैं तुफान मन में ,
हुँ अभी मंझधार में ,
फिर किनारे को चला ।
मन विजय करने चला ।

भुल बैठा अपना सपना ,
भुल बैठा अपना सब कुछ ,
अपने लिये मैं कुछ नहीं ,
अपनों के लिये कुछ करने चला ।
मन विजय करने चला ।

देख कर दंग हुँ ,
टूटे फुलों का कुछ अस्तित्व ही नहीं ,
टूट कर पत्ती भी मिट्टी में मिलें ,
ङर गया मैं देख कर अन्त इनका ,
अब मगर मैं शाख़ बनने चला ।
मन विजय करने चला ।

क्या कहूँ किससे कहूँ ,
कौन समझेगा मुझे ,
हर किसी की उलझनें ,
हर किसी की जिन्दगी ,
सबको अपनी ही पङ़ी हैं ,
मैं भी कुछ अपनी करने चला ।
मन विजय करने चला ।।

4 responses »

  1. आप तो अच्छी कविताएँ लिख लेती हैं । शब्दों की सरलता प्रभावी हैं ।

    हिन्दी में लिखने की अपनी राह खुद खोज निकाली , काफी अच्छा लगा ।

    वैसे ऐसी प्रचेष्टा रही तो मन एक दिन जरूर विजयी होगा ।

    शुभकामनाएँ ।

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