मैंनें देखा बन के पंछी…….

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मैंनें देखा बन के पंछी ,
नीलगगन में उड़ के देखा ।

मैंनें देखा बन के किरणें ,
चारों और बिखर के देखा ।

मैंनें देखा बन के धारा ,
साहिल से मिल बिछड़ के देखा ।

मैंनें देखा बन के महक ,
फुलों के घर में बस के देखा ।

मैंनें देखा बन के सपना ,
आंखों से मोती जैसे झर के देखा ।

मैंनें देखा पा के सब कुछ ,
सब कुछ मैनें खो के देखा ।

मैंनें देखा इतना सब कुछ ,
पर कोई ना अपने जैसा देखा ।

फिर बन के देखा आईना तो ,
सबको अपने जैसा देखा…………..

6 responses »

  1. मैंनें देखा बन के पंछी…….
    Posted by hemjyotsana “Deep” on March 9, 2007

    मैंनें देखा बन के पंछी ,
    नीलगगन में उड़ के देखा ।

    मैंनें देखा बन के किरणें ,
    चारों और बिखर के देखा ।

    मैंनें देखा बन के धारा ,
    साहिल से मिल बिछड़ के देखा ।

    मैंनें देखा बन के महक ,
    फुलों के घर में बस के देखा ।

    मैंनें देखा बन के सपना ,
    आंखों से मोती जैसे झर के देखा ।

    मैंनें देखा पा के सब कुछ ,
    सब कुछ मैनें खो के देखा ।

    मैंनें देखा इतना सब कुछ ,
    पर कोई ना अपने जैसा देखा ।

    फिर बन के देखा आईना तो ,
    सबको अपने जैसा देखा…………..

    ALL THE WORDS ARE TRUE TO LIFE. REALLY YOU HAVE WRITTEN WELL. PLEASE CARRY ON. I BEING A READER OF YOUR BLOG WISH FOR YOUR ALL SUCCESS IN LIFE. AAP BAHUT KHUB LIKHTE HO, MURDO MEIN BHI JAAN DAAL DETE HO. REALLY INSPIRED WITH YOUR POETRY.

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