लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

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जिंदगी कई बार

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on फ़रवरी 9, 2009


जिंदगी कई बार हमें अंधेरे में लाके छोड़ देती है |
दर्द में बेहाल बेबस छोड़ देती है
ना मैं नज़र आता हूँ ना रास्ता नजर आता है
दूर तक बस अँधेरा नज़र आता है
तड़पता हूँ रोता हूँ
झड़ता हूँ बिगड़ता हूँ
फ़िर लाचार सा गिर जाता हूँ
ठोकरों के शहर में बिना मरहम दिल तोड देती हैं
जिंदगी कई बार अंधेरे में लाके छोड़ देती है
सोच के कुछ घोडे दौड़ने लगते है
छुटे साथी , जी को झंक्झोरने लगते है
फ़िर अचनाक से एक हीरा चमकता है
अंधेरे में रोशन सा नज़र आता है
उसे पाके मैं मचल पड़ता हूँ
उसी अंधेरे में चल पड़ता हूँ
रोशनी मिलती है हौसला मिलता है
रास्ता जैसे कदमो के साथ चलता है
बदलता कुछ नही पर सब कुछ बदलता है
जानते है वो हीरा कौन है ?

वो हीरा मैं हूँ और वो अँधेरा कोयले की खान है
जिंदगी बस कुछ देर मुझे मेरे साथ अकेला छोड़ देती है |

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कल

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on जनवरी 23, 2009


कल याद मेरी उसे रुला आई है ।
कल बात मेरी बिगड़ती बना आई है ।

कल शाम सुबह सा मन्ज़र कर ,
कल रात मेरी पतझड़ बहार आई है ।

कल क्या था कुछ खास नहीं ,
कल शाख मेरी लहरा लहरा आई है ।

कल चुप चाप दबे पावं चला आया ,
कल आवाज़ मेरी वहाँ से आई है ।

कल-कल कल-कल कल बहता रहता था ,
कल नदिया मेरी साहिल बह कर आई है ।

कल याद मेरी ….

कल तुम जागे सोये से , बातों में खोये से ,
कल धूप मेरी छांव पर छाई है ।

कल इक दस्तक सी मौजूद रही ,
कल जिन्दगी मेरी चल के फ़िर आई है ।

कल कल था या ख्वाब कोई था ,
कल आंगन मेरी खुँशियाँ खुशबू छाई है ।

कल बुझा बुझा सा था “दीप “
कल रोशनी मेरी नये नूर नहाई है ।

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बापू का ख़त

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on दिसम्बर 11, 2008


प्रिय देशवासियों ,

मैं यहाँ स्वर्ग में कुशल-मंगल हूँ आशा करता हूँ भारत में भी सब कुशल-मंगल ही होगा ।

इन दिनों सुभाष के कई शिष्ये ( शहीद ) आये और मंगल भगत भी वापस आने की तैयारी में लग रहे हैं  तो मुझे लगा देश में सब थीक तो है या नहीं ?

आज देखा तो पता लगा मेरे देश में तो सब मेरे सिध्दांत आँख बन्द कर के माने जा रहे । कोई एक शहर में धमाके करता हैं तो आप उसे दुसरे शहर को आगे कर देते हो । जयपुर के बाद दिल्ली फ़िर कोई और अब मुम्बई के बाद किस्से बरबाद करवाने वाले हो ?

मेरे नाम पर क्या अपनी बेबसी मजबूरी कमजोरी छुपा रहे हो ? ये तो नहीं था मेरे सिध्दांत । मेरे और मेरे साथियों के बलिदान का यही मतलब निकाला है आपने सबने । पर इस बार शायद में नहीं आउंगा और आ भी गया तो शायद आजाद ना करा पाउँ ।

मुझे माफ़ करो , अपनी नाकमी को अहिंसा नाम मत दो ।

आपका अपना ,

बापू

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