लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

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तुम ख़्यालो में हमको बुलाया करो

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on दिसम्बर 13, 2007


एक गीत 

तुम ख़्यालो में हमको बुलाया करो  ,
हम हक़ीकत में एक दिन चले आएगे,

यूँ तुम बिन तो ख़ामोश आवाज़ है ,
तुम से हमको हैं करनी कई बातें पर ,
तुम हमे अपने किस्से सुनाया करो ,
हम तुम्हारे ही क़िस्सों में चले आएगे |

खड़े हैं हर मोड़ पे मुंतजिर से हम ,
कभी तुम जो गुजरो किसी मोड़ से ,
अपनी नज़रो से हर और देखा करो ,
हम तुम्हे वही पे कही  नज़र आएगे |

कभी जब लगे तुम को तन्हाई सी ,
या कही पे कभी सुकून ना मिले ,
तुम हमे नाम लेके पुकारा करो ,
हम उसी वक़्त मिलने चले आएगे |

कभी लड़खड़ाते क़दमो से रुक ने लगो ,
तुम मुझे याद कर अपना सहारा बनो ,
और हमसफर हमे बुलाया करो ,
हम साथ  तुम्हारा  देने चले आएगे |

कभी जब परेशान दुनिया करे ,
या कोई बात तुम्हे सताया करे ,
बेवजह तुम यूँही मुस्कुराया करो ,
हम हँसी तेरी सुन के चले आएगे |

ख़ामोशी में जब लगे घड़ी ग़ुज़ने ,
अंधेरो में जब डूब जाए जंहा ,
तुम अपने घर में ”दीप जलाया करो ,
हम तुन्हे उसमे ही रोशन नज़र आएगे |

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सुनाता रहा हूँ तुझे दिल की बातें

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on दिसम्बर 11, 2007


सुनाता रहा हूँ तुझे दिल की बातें ,
तेरी आरज़ू में जिए जा रहा हूँ |

हूँ मदहोश या मैं दीवाना हूँ तेरा ,
तुझे हर तरफ़ हर घड़ी पा रहा हूँ |

भटकता रहा मैं रोशनी में भी लेकिन 
अंधेरो में भी अब तुझे पा रहा हूँ |

यूँ चल तो रहा हूँ मगर ना ख़बर हैं ,
मैं कैसे कहाँ और किधर जा रहा हूँ |

मगर इस यकीं पे मैं चल तो रहा हूँ ,
कि हो ना हो तेरे क़रीब  रहा हूँ |

तुझे पाके तुझको ही मांगता हूँ ,
तेरी दुआ मैं भी चला  रहा हूँ |

लिखें हैं जो मैने नहीं गीत मेरे ,
तेरी धड़कानो को बस गा रहा हूँ |

वहाँ जागता हैं रातों को तू भी ,
बन के दीप मैं भी जले जा रहा हूँ 

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बिछुड़ ने की कोई रस्म नहीं होती

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on दिसम्बर 3, 2007


तुझ से मिलने की ख़्वाहिश मेरी कभी कम नहीं होती 
मेरे हाथों की लकीरों से  , मेरी लड़ाई ख़त्म नही होती 

यूँ तो रोशन है दिल का कौना कौना तुझसे ,
कभी तो  , के तेरे बीन मेरे घर में रोशनी नहीं होती 

तुझे तो मिलना है मुझ से मेरे साथ जीना है ,
ये अलग बात के  ,खुदा से मेरी जंग ख़त्म नहीं होती ,

यहाँ के दरो-दीवार भी ख़फा रहते है मुझ से ,
ख़ुशबू- -नज़रों की  भी शिकायत कम नहीं होती ,

आ मेरे पास कभी यूँ गुन-गुनाता रहूँ तुझ को ,
मेरे ज़ुबान पर तेरी तारीफ़े  , कभी ख़त्म नहीं होती

हम जो मिलेगे , ना बिछहड़ेगे कभी फिर से ,
मिलने के बाद , बिछुड़ ने की कोई रस्म नहीं होती ,

मैने ये कब कहा के तू मेरी साँसे धड़कन ज़िंदगी है ,
मगर तेरे बिन ये मेरी ज़िंदगी , ज़िंदगी नहीं होती 

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रिदा बदला ना करो

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on अक्टूबर 23, 2007


साथ रह कर रिश्ता सा बन जाता हैं ,
                                  यूँ बेवजह किताबों की रिदा बदला ना करो |
 ये बेबसी मार डालेगी ना मिल पाने की ,
                            इतने अच्छे क्यूँ हो इतना याद आया ना करो |

बात जो भी हो  जैसी भी कहो मुझ से ,
                        देखो , कुछ  भी मुझ से कभी , छिपाया ना करो |
सुन कर मिलने की खलिश और बढ़ती हैं ,
                        दर्द दिल में होतो हँसती आवाज़ सुनाया ना करो |

कैसे सम्भलेगा मुझ से इतना सब कुछ ,
                 हँसना रोना ,जीना मरना , नया कुछ सिखाया ना करो|
मेरा कुछ मुझ में भी रहने दो,
                             अब नया ख्वाब मेरे दिल में जगाया ना करो |

खुल के उड़ने लगता हूँ अपने पिंजरे में ,
                       हल्का हो जाउ पंछी की तरह , यूँ रुलाया ना करो।
मेरे अश्क ख़ुद तेरी आँखों से गिरने लगे ,
                            माना तेरा हूँ मगर इतना भी सताया ना करो |

नाम जो चाहो दे दो ,पत्थर भी सही ,
                                     मगर पत्थरों में भी खुदा बनाया ना करो|
कब किसको कितना मिले ?,
                  बेवजह ही सही ख़ुश रहो ,कोई पल गँवाया ना करो |

एक दिन गिर ना जाउ , तन्हाई में घबराके ,
                             मुझे इतना उपर भी अकेले बिठाया ना करो |
रोशनी करनी हो तो जलाओ मुझे , दीप हूँ  मै,
                 ख़ुद तुम जल जाओ इतने क़रीब भी आया ना करो |

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कत्लें आम किया

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on अक्टूबर 9, 2007


क्यूँ ज़ुबान छीनी मेरी , क्यूँ मुझे बेज़ुबान किया ।
मैंने कब तेरी बेवफ़ाई का चर्चा खुलेआम किया ।

ये माना के मैं निभा ना सका रस्म-ए-उल्फत ,
तुने भी कहाँ – कब , वफ़ा का कोई काम किया ।

इसी से बहल जायेगा दिल नादां ही तो है ,
तेरी गली में करके सज़दे हमने बहुत नाम किया ।

परदे में रखा है तेरा नाम साये को भी खबर नहीं ,
तुने ही बदनाम मुझे , बेवजह सर-ए-आम किया ।

सभी ने लगाये इल्ज़ाम मेरी बेगुनाई पर बहुत ,
कहा तुने भी, दीप ने परवानो का कत्लें आम किया ।

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ग़म पे मेरे वाह-2 किये जाते हैं

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on अक्टूबर 4, 2007


ज़िंदगी तुझको गुनगुना ना सके ,
मौत को ही ,शब्द दिए जाते हैं .

तेरी यादों में हर पल -ख़ुशी
ज़ख़्म ,अश्को से सिये जाते हैं ,

तू तो संग ना चल सकेगा मेरे ,
संग तस्वीर तेरी लिए जाते हैं ,

हाँ , ख़ुशी को तो सुन ना सके ,
ग़म पे मेरे वाह-2 किये जाते हैं ,

कोई भी ना आया जब थे प्यासे ,
अब तो बस अश्क पिये जाते हैं ,

ये दुआ है या ,’दीप’ सज़ा है कोई ,
बस यूँही , बेवजह जिये जाते हैं ,

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जिन्दगी मौत और हम….

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on सितम्बर 20, 2007


दुनिया में क्या है तन्हा ,
जिन्दगी मौत और हम ।

दुनिया में क्या है बेवजह ,
जिन्दगी मौत और हम ।

दुनिया में क्या है बिखरा ,
जिन्दगी मौत और हम ।

दुनिया में क्या है अपना ,
जिन्दगी मौत और हम ।

दुनिया में क्या है बुरा ,
जिन्दगी मौत और हम ।

दुनिया में क्या है उलझा ,
जिन्दगी मौत और हम ।

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