लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

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बेहाल ज़िन्दगी के

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on जनवरी 5, 2009


पन्नों में जल रहे थे कुछ साल ज़िन्दगी के ,
धुआँ धुआँ से हो गये कई ख्याल ज़िन्दगी के ।

एक तेरी याद है बस जो दिल बेहलाती है ,
वरना सताते हैं हमे कई सवाल ज़िन्दगी के ।

वफ़ा मोहब्बत में ,दोस्ती में बेवफ़ाई ,
होते है कई तजूर्बें बेमिसाल ज़िन्दगी के ।

हंसते चेहरे जलते पावं , नदिया चिडियाँ गावं ,
हर पल नजर आते हैं कमाल ज़िन्दगी के ।

शाम से सुबह ,सुबह से रात का सफ़र ,
मालिक हैं हम ऎसी बेहाल ज़िन्दगी के ।

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हंसीन था ये सपना

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on मार्च 7, 2008


मेरे आशियाने में  , तेरी कसम तेरी ही कमी थी ।
थे चांद तारे , खुदा और तेरी तस्वीरें लगी थी ।
बहुत कम थे गम , वहाँ तो बस खुशीयाँ ही पल रही थी ।
अन्धियारे की दावत हुई , उजालों की महफ़िल सजी थी ।
जो आँखे खुली तो था बन्द कमरा ,
अन्धेरे में  बिस्तर पर मैं लेटी हुई थी ।
हसीन था ये सपना इतना कि जाग कर  ,
 रात भर ,  तेरी याद में मैं रोती रही थी ।

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हम वो राही हैं जिन्हे

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on फ़रवरी 27, 2008


कुछ रंगो को तुलिका की ज़रूरत नहीं होती 
हर बात को कहने के लिए जुबां की ज़रूरत नहीं होती 
हम वो राही हैं जिन्हे 
मंज़िल के लिए कारवाँ की ज़रूरत नहीं होती |
.
मर्ज क्या है , मिलने पर तेरे दवा की ज़रूरत नहीं होती |
कौन हो तुम ,जिससे कहने के लिए भूमिका की ज़रूरत नहीं होती |
विश्‍वास रिश्तों पर हो तो काफ़ी हैं ,
दोस्त को परखने के लिए इम्तहान की ज़रूरत नहीं होती |

सुनता हैं खुदा सबकी  , किसी किसी को दुआ की ज़रूरत नहीं होती |
बसा करते हैं यादों के मंदिर में ,उन्हे मकान की ज़रूरत नहीं होती |
तुम तो  आवाज़ से पहचान लेते हो ,
तेरे आगे बेवजह मुस्कुराने की ज़रूरत नहीं होती |

खुशियाँ लिए बैठे रहते हैं ,पर रोने के लिए बहाने की ज़रूरत नहीं होती |
क्या बात हैं इस रिश्ते में ,दोस्त के मिलने पर जमाने की ज़रूरत नहीं होती |
जिंदगी में ही जो मरते हैं हर पल के साथ,
उन्हे मौत से मिल के मरने की ज़रूरत नहीं होती |

एहसास आँखो से बात करते  तो ,दीप को कविता की ज़रूरत नहीं होती | नाव सुरक्षित हैं किनारे पर ,पर इसे लहरो से लड़ना सीखने की ज़रूरत नहीं होती |
बनाने  वाला जब खुदा है तो मिट नहीं सकते ,
जिसे रोशन करती हैं हवा , उस दीप को बचाने की ज़रूरत नहीं होती |

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कविता हूँ मैं

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on फ़रवरी 27, 2008


हंसी खुशी ,रिश्ते नाते ,एहसास दोस्ती से मिल कर बनी कविता हूँ मैं ,

जो अपनी होकर भी , बुरी लगे , एक ऎसी ही अजीब दुविधा हूँ मैं ,

अशोक के गर्म खून सी, बौध्द शान्ति में पली , गुमनाम संगमित्रा हूँ मैं ,

शब्द से निर्मित हूँ , शब्द अन्त है मेरा ,

मुक्त छोड दो तो खो जाती हूँ , हर बार बाधंनी जो पडे , एक ऎसी भुमिका हुँ मैं ।

हुनर जिसका भीड में नजर आता है , वो एक छोटी सी कणिका हूँ मैं ।

जिसके दामन में अश्क गिर के सोते है ,शायद ऎसी एक अंकिता हूँ मैं ।

जिन्दगी के  रंगो से भरी , जख्मो से हर बार सजी ,

खुद से मिल खुद खो जाने वाली  , एक अनजान चित्रा हूँ मैं ।

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के तुम आ गये

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on फ़रवरी 6, 2008


एक  गीत 

बेख़बर जिंदगी से जी रहे थे के तुम  गये |
कहुँ कैसे मरे जा रहे थे के तुम आ गये |

हे मजिंल कहाँ और राहें ये कैसी ,
यूँ ही बेवजह चले जा रहे थे के तुम आ गये |

कभी तो सुनू  हाल--दिल तुझसे तेरा ,
शोर--दुनिया सुने जा रहे थे के तुम  गये |

मुझे मुस्कुराने की आदत नहीं थी ,
बेसबब  हम रोए जा रहे थे के तुम  गये |

थे टूटे हुए पर , थे टूटे हुए ,
पर , ना बिखर पा रहे थे के तुम  गये |

थी वीरान दुनिया ख्वाबो की मेरी ,
ख्यालो में भी थे खामोशी के साये ,के तुम  गये |

जो सर को झुका लूँ ,लगे सामने तुम ,
जो आँखे करू बंद , नज़र आए तुम ,
तुम ही ये बताओ के तुम कौन हो ?
खुद ही से तेरी बातें किए जा रहे के तुम  गये |

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दीप कहाँ है तू ?

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on जनवरी 7, 2008


आती है पश्‍चिम से ये तूफ़ानी हवाएँ ,
घनघोर अंधेरा , छत पर आकर बादल लाएँ ,
मेरे कमरे को रोशन करता , दीप कहाँ है तू ?
गरज गरज कर बादल बरसे ,
बन्द दरवाजे पर देती दस्तक हवाएँ ,
कमरे में घुसने को आतुर ठंडी हवाएँ ,
डरा हुआ सहमा सा ,
कोने से ही देख रहा हूँ कमरा अंधियारा ,
अब तक तेरा साथ रहा है , तो तू बिछड़ा क्यूँ ?
दीप कहाँ है तू ?
चारों ओर है दबी दबी आवाज़े ,
कानो में अनचाहा  अनकहा कह जाती हवाएँ ,
तूफ़ानो से तू लड़ता था जब ,
देखा करता था तुझको मैं ,
देख देख सीखा तुझसे , फिर तू बिछड़ा क्यूँ ?
दीप कहाँ है तू ?
अब फिर आकर रोशन हो जा ,
थका हुआ  डरा हुआ सा ,
मैं बस तुझको ढूंढूं रहा हूँ ,
दीप कहाँ है तू ?
थक हार के जब बैठा पलभर ,
पलक करी जब बन्द पलभर ,
झिलमिल तुझको मन के अंदर रोशन पाया ,
भूल गया मैं , मेरे जीवन का दीप यहाँ है तू |

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जिन्दगी में बहुत काम आया हमें

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on जनवरी 2, 2008


जो गम देके तुमने सिखाया हमें ।
जिन्दगी में बहुत काम आया हमें ।
जब लगी ठोकर , गिर के बैठ गये ,
 तब लगा पास तुमने बिठाया हमें ।
गुजर जाते बरसो मगर ना समझते ,
चन्द लम्हों में तुमने समझाया हमें ।
 हे वही फिर भी, नई सी लगी ,
जाने कैसे दुनिया को तुमने दिखाया हमें ।
जो हुऐ हम परेशां , कहीं पे कभी ,
 आ-आ के यादों में बहुत बहलाया हमें।
कभी जब लगा रुठे बैठे हैं हम ,
 तो बहुत खूब तुमने मनाया हमें ।
जानते थे हम भी कुछ मगर ,
लगा जैसे सब तुम्ही ने बताया हमे ।

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