लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

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कुछ गीत तुम्हारे देदो

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on मार्च 6, 2009


कुछ सपने लेकर मेरे कुछ गीत तुम्हारे देदो ।
लेकर सब सुर साज मेरे आवाज़ तुम्हारी देदो ।

सन्नाटे में सांसे अक्सर शोर मचाती हैं ,
दिल की धड़कन गीत कोई गाती हैं ,
सुनता हूँ जो गीत शब्दो से है बना नहीं ,
मेरे बोलो को तुम अपनी रवानी देदो ।

कुछ सपने लेकर मेरे कुछ गीत तुम्हारे देदो ।
लेकर सब सुर साज मेरे आवाज़ तुम्हारी देदो ।

चलती फ़िरती दुनिया में थमसा गया हूँ मैं ,
भटक रहा हूँ और थकसा गया हूँ मैं ,
सब से मिलता हूँ लेकिन किसी कुछ भी कहा नहीं ,
तुम अपले किस्से बुल कर मुझको कहानी देदो ।

कुछ सपने लेकर मेरे कुछ गीत तुम्हारे देदो ।
लेकर सब सुर साज मेरे आवाज़ तुम्हारी देदो ।

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2 साल -एक सफ़र

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on मार्च 2, 2009


2 मार्च 2007 ,
जब मैनें अपने ब्लोग पर पहली पोस्ट की थी तो ये नहीं जानती थी कि आगे क्या होगा ।
बस युँ ही ब्लोग बनाया और फ़िर ….

यूँ सफ़र पे चल दिये थे के मंजिल का ना पता था ,
हम बह रहे थे युँ ही के साहिल का ना पता था ।

कविता मेरे लिये शब्दो की कोई जादुगरी सी नहीं बल्कि ज़िन्दगी से बात करने का एक रास्ता है । मैं जब भी ज़िन्दगी से बात करती हुँ या ज़िन्दगी की बात करती हूँ लिखने लगा जाती है जिसे कभी कविता कभी नज्म ……. या कभी हजल कह देती हूँ । बस ये मेरी रचनाये हैं जो मेरी तरह ही नियमों में बन्धना नहीं चाहती ।

लम्हे जिन्दगी के से मुझे बहुत कुछ मिला …….. ये मेरा एक साथी है जो मुझे समझता है मुझसे बात करता हैं जिसके जरिये में दुनिया से बात करती हूँ ।

लम्हे ज़िन्दगी के ने मुझे मेरे एक कमरे से एक नई दुनिया दिखाई जिसमे मुझे मेरी सोच और मेरे शब्दो के ने एक जगह बनाने दी है इस दुनिया में लगभग सभी मुझे नहीं जान कर भी जानते है ।

यहाँ मैनें बहुत सीखा और ये सब आप सब पढ़ने वालो के कारण जिन्होने मुझे सही और गलत समय समय पर बताया ।

कई नाम है पर सब से पहले जिन्हे में अपना यहाँ गुरू मानती हुँ महावीर सर , देवी नानरानी ,रमा जी
बहुत बहुत शुक्रिया आप से बहुत कुछ सीखा है और अभी बहुत कुछ सिखना हैं आप सब के मार्गदर्शन के लिये बहुत बहुत शुकिया ।
महावीर सर के ब्लोग पर हुए बरखा-बहार मुशयरा मेरा पहला मुशयरा था और मुझे बेहद खुशी है के मैं अपना पहला मुशायरा महावीर जी सर की छत्र-छाया में किया ।

प्रेम पीयुष सर , समीर लाल जी ,सागर नाहर जी आप ने हमेशा मेरी हौसला बनाये रखा ।

कई और भी है सब नाम यहाँ लेना तो बहुत मुश्किल है पर
आप सभी जिन्होने मुझे पढा़ प्रतिक्रिया दी ………. बहुत बहुत धन्येवाद ।

उम्मीद है आगे भी आप सब का सहयोग आगे भी मिलता रहेगा ।

लम्हे ज़िन्दगी के ने मुझे एक पहचान दी है । वर्ष 2007-08 के २० ब्लोग की सुची में खुद को पाकर अच्छा लगा था ।

आज एक और बहुत अच्छी खबर मै आप सब को सुनाना चाहती हूँ ……
मेरी एक कविता
हे जीव जगत के मनुज सुन
तु बलशाली है थक हार नहीं ।

जिसे 27 जुलाई 2007 को ब्लोग पर लगाया था ।

आज एक विघालय HPS (हरियाणा पब्लिक स्कूल) डा़बवली की प्रार्थना बन गई है ।
जिसे खुद विघालय के डाइरेटर श्री रमेश सचदेव ने कम्पोस करवा कर मुझे भेजी हैं ।
रमेश सचदेव जी ने सब से मेरी रचनाये पढी़ हैं मुझे अपनी छॊटी बहन मानते है ।
रमेश जी बहुत बहुत धन्यवाद ।

RAMESH SACHDEVA (DIRECTOR)
HPS SENIOR SECONDARY SCHOOL
M. DABWALI-125104

मुझे अच्छा लगा सुन कर ,जान कर कि मेरी एक कविता एक विघालय में हर सुबह गुँज उठती हैं और इस लिये में रमेश जी की बहुत आभारी हूँ जिन्होने मेरी कविता को इस लायक समझा ।

रमेश जी ने मुझे भी वो रिकोर्डिग भेजी है इस में आवाज रमेश जी के मित्र Mr. Balzinder जी की है ।
Mr. Balzinder और सभी Composer को धन्येवाद ।


ब्लोग विवरण (1 मार्च 2009 तक )–

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दीप ,दीप क्युँ है ?

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दीप , दीप क्यूँ हैं ?

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on मार्च 2, 2009


मैं खडी़ की खडी़ रह गई और मेरे साथ वाले मुझ से कौसों आगे निकल गये । मुझ से बहुत पीछे वाले भी आगे बढ़ते रहे और मैं…… वहीं की वहीं ।
ना जाने जिन्दगी क्या चाहती थी । उस अन्धेरे से भरी जिन्दगी में कुछ साथ रुकने को तैयार नहीं … बस मैं और अन्धेरा और अन्धेरे में फ़ैला मेरा ही साया ।

उस अन्धेरे में मैनें एक घर बनाया बिल्कुल रोशनी से भरा हो जैसे….. बहुत वक्त उस घर को अपना समझा और हकीकत समझा…….. और एक दिन एक रोशनी कुछ पल को आई और बता गई कुछ भी नहीं हैं ।

जिन्दगी की एक अजीब सी उस बेबसी को १ साल तक बस देखा और देखती रही । ना कुछ किया जा सकता था ना कुछ किया ।

सुना करती थी कि एक लड़की हुआ करती मुझ जैसी बिल्कुल मुझ जैसी ……. बहुत खुश मिजाज हर समस्या का समाधान था उसके पास , उस के आस पास गम आता तो था पर खो जाता था । लेकिन जिन्दगी तो ना जाने क्या चाहती थी ।

उसी दौर में मैनें अन्धेरे में मिट्टी उठाई और एक दीप बनाया ………
फ़िर देखते ही देखते वो दीप जलने लगा ।
बस फ़िर क्या था सुबह शाम दिन रात उसी को देख देख कर वक्त निकाला ।
जिन्दगी में कुछ बदला नहीं था उस अन्धेरे में कोई आज भी नहीं रुकता पर वो दीप आज भी मेरे साथ हैं ।
मुझे बिखरने से बचाता है । मेरी बातें सुनता है । मुझ से बातें करता हैं ।

उस ने मुझे कई बार खोने से बचाया । मैं हालातों में जब अपने आप को भुलने लगती हूँ वो मुझे अपने आप से मिला जाता है ।

मुझ से कई बार पुछा गया हैं कि मैने अपना नाम दीप क्यूँ रखा हैं । इसका कारण यही है ।
मैने दीप को जिन्दगी के हर दौर में हर हाल में सिर्फ़ अपना काम करते देखा है । दीप ना कुछ कहता है ना सुनता है । बस अपना काम करता जाता है ।

मन्दिर में इबादत करता है । मातम में उम्मीद जलाये रखाता है । दीवाली में खुशाहाली , अन्धेरे में रोशनी , राह में सही रास्ता ।

वो दीप जो रोशनी का साथी तो हैं मगर साथ अन्धेरे का भी देता है । वो दीप जो सब को रोशनी बाटँता है मगर अपने दामन में अन्धेरे को पनाह देता है । वो दीप जो बाती को वो मुकाम देता है जहाँ उसका जीवन सफ़ल हो जाये ।

मैं वही दीप बनना चाहती हुँ । वो दीप जो मैनें अन्धेरे में बनाया था आज मेरी जिन्दगी हैं । उस दीप का नाम “लम्हे ज़िन्दगी के ” ।

और आज उस दीप को जलते हुऎ २ साल हो चले ।

मेरे शब्दो में वो ताकत नहीं जो उन ३ सालो को या पिछले 9 सालो को बयान कर सके …….. पर आज अगर मैं हुँ तो उसकी एक सबसे बडी वजह लम्हे जिन्दगी के है जिसने मुझे उस मुश्किल दौर से सम्भाला ।

और लम्हे जिन्दगी के आप सब की वजह से ….. आप सब पढ़ने वालों की वजह से हैं । आप सब अगर पढ़ते नहीं तो मैं इसे बरकार नहीं रखा पाती ।

इस लिये शुक्रिया आप सब का ।

सादर
हेम ज्योत्स्ना “दीप”

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तुम वो बहर बनो

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on फ़रवरी 20, 2009


मेरे ज़िन्दगी के सफर में तुम
मेरी चाह है हमसफ़र बनो
यही ख्वाब है मेरा एक
हर नजारा तुम हर नजर बनो |

जहाँ हो वफ़ा हर शाम में ,
जहाँ ज़िन्दगी हर जाम में ,
जहाँ चाँदनी हर रात हो ,
उम्मीद की हर सहर बनो |

मैं नहीं काबिल तेरे बना ,
तू फलक मैं गर्दिश भला !
तू पूनम , मैं मावस की रात ,
नही बने मेरे वास्ते मगर बनो |

नही मेरे लिखने में वजन कोई
नही साज पर कोई गीत चढा |
ना लिख सका कोई ग़ज़ल ,
गुनगुना सकूँ तुम वो बहर बनो |

मेरी नही पतवार कोई
मेरा नही माझी कोई
मैं हूँ तन्हा मंझधार में ,
कश्ती को दे किनारा वो लहर बनो |

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जिंदगी कई बार

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on फ़रवरी 9, 2009


जिंदगी कई बार हमें अंधेरे में लाके छोड़ देती है |
दर्द में बेहाल बेबस छोड़ देती है
ना मैं नज़र आता हूँ ना रास्ता नजर आता है
दूर तक बस अँधेरा नज़र आता है
तड़पता हूँ रोता हूँ
झड़ता हूँ बिगड़ता हूँ
फ़िर लाचार सा गिर जाता हूँ
ठोकरों के शहर में बिना मरहम दिल तोड देती हैं
जिंदगी कई बार अंधेरे में लाके छोड़ देती है
सोच के कुछ घोडे दौड़ने लगते है
छुटे साथी , जी को झंक्झोरने लगते है
फ़िर अचनाक से एक हीरा चमकता है
अंधेरे में रोशन सा नज़र आता है
उसे पाके मैं मचल पड़ता हूँ
उसी अंधेरे में चल पड़ता हूँ
रोशनी मिलती है हौसला मिलता है
रास्ता जैसे कदमो के साथ चलता है
बदलता कुछ नही पर सब कुछ बदलता है
जानते है वो हीरा कौन है ?

वो हीरा मैं हूँ और वो अँधेरा कोयले की खान है
जिंदगी बस कुछ देर मुझे मेरे साथ अकेला छोड़ देती है |

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हौसलों के देश में

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on जनवरी 25, 2009


एक कदम ही रखा ,हो खडा़ महल गया ,
दिल मेरा सम्भल गया , टूट कर सवरं गया ,
हौसलों के देश में , हौसलों के देश में ।

देश है ये इक नया , इक अलग जहाँन है ,
हारता नहीं कोई , जीत ही मुकाम है ,
हौसलों के देश में , हौसलों के देश में ।

ना कहीं जमीन है , ना कहीं मकान हैं ,
रोग इक नया लगा चैन और सुकून का ,
हौसलों के देश में , हौसलों के देश में ।

उठ खडे़ सभी हुऎ , गिर गये थे जो कहीं ,
दौड़ ने सभी लगे ,चल सके ना थे कभी ,
हौसलों के देश में , हौसलों के देश में ।

फ़ूल थे ना खार थे , शब्द थे ना बाण थे ,
हर तरफ़ जुनून था , काम का सुकून था ,
हौसलों के देश में , हौसलों के देश में ।

फ़िजुल था ना वक्त , काटनी उम्मीद की फ़सल जो थी ,
ना कोई जंग थी ,दोस्ती की नसल जो थी ,
हौसलों के देश में , हौसलों के देश में ।

सपना है मेरा, मेरा देश हो हौंसलों के देश सा ,
बने मेरा देश भी हौंसलॊ के देश सा ,
हौसलों के देश में , हौसलों के देश में ।

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कल

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on जनवरी 23, 2009


कल याद मेरी उसे रुला आई है ।
कल बात मेरी बिगड़ती बना आई है ।

कल शाम सुबह सा मन्ज़र कर ,
कल रात मेरी पतझड़ बहार आई है ।

कल क्या था कुछ खास नहीं ,
कल शाख मेरी लहरा लहरा आई है ।

कल चुप चाप दबे पावं चला आया ,
कल आवाज़ मेरी वहाँ से आई है ।

कल-कल कल-कल कल बहता रहता था ,
कल नदिया मेरी साहिल बह कर आई है ।

कल याद मेरी ….

कल तुम जागे सोये से , बातों में खोये से ,
कल धूप मेरी छांव पर छाई है ।

कल इक दस्तक सी मौजूद रही ,
कल जिन्दगी मेरी चल के फ़िर आई है ।

कल कल था या ख्वाब कोई था ,
कल आंगन मेरी खुँशियाँ खुशबू छाई है ।

कल बुझा बुझा सा था “दीप “
कल रोशनी मेरी नये नूर नहाई है ।

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