लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

पागल दिल था

Posted by hemjyotsana "Deep" on October 15, 2009

कल तुम गुजर रहे थे ,
या कोई ग़ज़ल गुनगुना रहा था ….

कल आहट थी कोई पहचानी ,
या कोई दरवाजे पर आ आ के जा रा था ….

कल चाँद था फलक पर ,
या तेरा चेहरा मुस्कुरा रहा था ….

मैने बहुत रोका मगर ,
वो ना था ना नज़र आरहा था ….

पागल दिल था शायद तुझे ,
तुम्हे हर शे में पा रहा था |

9 Responses to “पागल दिल था”

  1. बढ़िया कविता..प्रेम का सुंदर एहसास..

  2. आह!! बहुत बेहतरीन!

    सुख औ’ समृद्धि आपके अंगना झिलमिलाएँ,
    दीपक अमन के चारों दिशाओं में जगमगाएँ
    खुशियाँ आपके द्वार पर आकर खुशी मनाएँ..
    दीपावली पर्व की आपको ढेरों मंगलकामनाएँ!

    -समीर लाल ’समीर’

  3. सूक्ष्म भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति है इस रचना मे । यह उत्कट प्रेम की कविता है ।

  4. बहुत सुन्दर भाव!!

  5. mehek said

    कल आहट थी कोई पहचानी ,
    या कोई दरवाजे पर आ आ के जा रा था ….

    कल चाँद था फलक पर ,
    या तेरा चेहरा मुस्कुरा रहा था ….
    bahut sunder,ishq mein ek hi bhram aur ek hi aahat hoti hai,teri.
    hem ji deepwali ki hardik badhai.

  6. M Verma said

    सुन्दर एहसास — सुन्दर रचना

  7. Ramesh Sachdeva said

    पागल दिल था शायद तुझे ,
    तुम्हे हर शे में पा रहा था |

    YOU CAN CALL IT LOVE OR IT IS CALLED JANOON WHEN IT IS FOUND IN EVERYTHING.
    EXCELLENT ONE.
    ONCE AGAIN HAVING A LESSON TO TEACH …

  8. अच्छी रचना….. बधाई…

  9. harish said

    kisi ke intzaar me jindgi yun tabah hoti hai
    yun hi din nikalta hai yun hi shaam hoti hai

    prem ke ahsaason se bhari kavita ….ek abhivyakti …ek bhavna …

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