अन्धेरी रात उसने भी

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परिन्दो को कभी क्या , माँ ने उड़ना सिखाया था ,
उन्हे तो बस किसी शाख से गिरकर बताया था ।

तुम्ह भी चुप चाप चले आये हो महफ़िल से ,
तुम्हे भी क्या उसी ने जाम पिलाया था ।

हमे अब गम से दहशन नहीं कोई,
मिला के दर्द ,जाम खुशी का पिलाया था ।

शहर की गलियों के कुत्ते भी पहचान जाते ,
हिज्र के दिन किसने साथ निभाया था ।

संवर के टूट जाना है मुक्द्दर, मगर देखो ,
मेरे टूटे नसीबो पर वो भी मुस्कुराया था ।

सुना है बेवफा का तमगा दे गया वो ,
अन्धेरी रात उसने भी ये ’दीप’ जलाया था ।

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21 responses »

  1. बहुत अच्छा लिखा है आपने । भाव और विचारों की सुंदर प्रस्तुति है। सटीक शब्दों केचयन और विचारशीलता के समन्वय से लेखन प्रभावशाली हो गया है।
    मैने अपने ब्लाग पर एक लेख लिखा है-इन देशभक्त महिलाओं केजज्बे को सलाम-समय हो तो पढें़ और कमेंट भी दें।

    http://www.ashokvichar.blogspot.com

  2. RACHNA UMEED KE ANUSAR BAHUT ACHCHHI H.
    SHAYAD VISHAY BADAL GAYA H KANHI BICH MEIN.
    परिन्दो को कभी क्या माँ ने उड़ना सिखाया था ,
    उन्हे तो बस किसी शाक से गिरकर बताया था ।
    GAJAB H SABSE YEH PANKTIYA.
    HINSLA DETI H. BAHUT KUCHH SIKHATI H.
    RAMESH

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