लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

क्या करूँ

Posted by hemjyotsana "Deep" on July 11, 2009

दिल से तेरा ख्याल ना जाये तो क्या करूँ ।
तू ही बता तेरी याद आये तो क्या करूँ ।

हसरत है कि तुझे इक नजर देखूँ ,
किस्मत अगर ना दिखाये तो क्या करूँ ।

चारों तरफ़ तू ही नजर आये तो क्या करूँ ,
हवाये तेरी आवाज सुनाये तो क्या करूँ ।

मैं सर झुकाता हूँ सजदे में तेरे ही ,
तुझको ही ना नजर आये तो क्या करूँ ।

दिल में जलता हुँ, रात में जलता हूँ ,
तू ही “दीप” ना जलाये तो क्या करूँ ।

9 Responses to “क्या करूँ”

  1. mehek said

    मैं सर झुकाता हूँ सजदे में तेरे ही ,
    तुझको ही ना नजर आये तो क्या करूँ ।

    दिल में जलता हुँ, रात में जलता हूँ ,
    तू ही “दीप” ना जलाये तो क्या करूँ ।

    waah bahut khub,ehsaas bhi hai tere aur sawal bhi tujh se hi,tu jawab hi nahi deta kya karun.bahut dino baad aapko padhna achha laga.

  2. संगीता पुरी said

    बहुत बढिया !!

  3. arastu said

    दिल में जलता हुँ, रात में जलता हूँ ,
    तू ही “दीप” ना जलाये तो क्या करूँ ।
    kya baat hai in pan ktiyon ki

  4. MEET said

    Keep it up, Hem.

  5. RAMESH SACHDEVA said

    KISMAT AGAR NA DIKHAYE TO KYA KARU.

    BAHUT KHUB.
    RAAJ KOI GAHRA H,
    JALNE AUR JALANE PAR PAHRA H.

    SHUBH KAMNAYE

  6. pallav001 said

    really nice lines!! emotions rightly put up in words!!

  7. ramesh kc said

    न जाने कहाँ कहाँ से आपके ब्लग पे पहुचा देखता गया देखता और देखता गया और बहुत अच्छा लगा “क्या karu..”

  8. हेमज्योत्सना जी

    बहुत दिनो से आपको पढने की इच्छा थी, आज यह ब्लोग खोलने को मिला तो आपकी कविता पढकर मजा आ गया, बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति,

    मैं सर झुकाता हूँ सजदे में तेरे ही ,
    तुझको ही ना नजर आये तो क्या करूँ

    बहुत सुन्दर पन्क्ति

    बधाई

  9. praney said

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