कागज़ पर मंदिर
Posted by hemjyotsana "Deep" on April 1, 2009
रंग घुले है हवा में
मैंने रंगों रंगीनियों को कागज़ पर खिलते देखा
आवाज़ दिखती है फिजा में
मैंने मखमली आवाज़ को कागज़ पर चलते देखा
महक दिल से दिल तक समाती है
मैंने रूह की खुशबू को कागज़ पर महकते देखा
ख्वाबों से उतर के परीयाँ आती हैं
मैंने फरिश्तों को कागज़ पर उतरते देखा
बहुत सुना है मंदिर में सुकून है
मैंने लफ्जों से कागज़ पर मंदिर बनते देखा
बाग़ में मुरझाने की दहशत में हर फुल है
मैंने बगीचों को बेखौफ कागज़ पर चलते देखा
दर्द का ख़ुशी का जाम भर भर के पीया है मैंने
मैंने ज़िन्दगी को कागज़ पर झलकते देखा














दिनेशराय द्विवेदी said
सुंदर विचार पूर्ण कविता!
कौतुक said
सुन्दर.
बाग़ में मुरझाने की दहशत में हर फुल है
मैंने बगीचों को बेखौफ कागज़ पर चलते देखा
renu said
बहुत सुना है मंदिर मे सुकून है
मैनेलफ़्ज़ों से कागज पर मंदिर बनते देखा
और
दर्द का खुशी का जाम भर भर कर पिया है मैने
मैने जिंदगी को कागज पर झलकते देखा
बहुत सुंदर……
jitendra baghel said
Aaj fir dekha kagaz per mandeer ko bante hue
Avinash said
Excellent poem
meaning ful poem which touches the ones heart
congratualtions all the best
With regards
Avinash