लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

कागज़ पर मंदिर

Posted by hemjyotsana "Deep" on April 1, 2009

रंग घुले है हवा में
मैंने रंगों रंगीनियों को कागज़ पर खिलते देखा

आवाज़ दिखती है फिजा में
मैंने मखमली आवाज़ को कागज़ पर चलते देखा 

महक दिल से दिल तक समाती है
मैंने रूह की खुशबू को कागज़ पर महकते देखा 

ख्वाबों  से उतर के परीयाँ आती हैं
मैंने फरिश्तों को कागज़ पर उतरते देखा 

बहुत सुना है मंदिर में सुकून है
मैंने लफ्जों से कागज़ पर मंदिर बनते देखा 

बाग़ में मुरझाने की दहशत में हर फुल है
मैंने बगीचों को बेखौफ कागज़ पर चलते देखा 

दर्द का ख़ुशी का जाम भर भर के पीया है मैंने
मैंने ज़िन्दगी को कागज़ पर झलकते देखा

5 Responses to “कागज़ पर मंदिर”

  1. सुंदर विचार पूर्ण कविता!

  2. सुन्दर.

    बाग़ में मुरझाने की दहशत में हर फुल है
    मैंने बगीचों को बेखौफ कागज़ पर चलते देखा

  3. renu said

    बहुत सुना है मंदिर मे सुकून है
    मैनेलफ़्ज़ों से कागज पर मंदिर बनते देखा

    और

    दर्द का खुशी का जाम भर भर कर पिया है मैने
    मैने जिंदगी को कागज पर झलकते देखा

    बहुत सुंदर……

  4. jitendra baghel said

    Aaj fir dekha kagaz per mandeer ko bante hue

  5. Avinash said

    Excellent poem
    meaning ful poem which touches the ones heart

    congratualtions all the best

    With regards
    Avinash

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