गुनाह होते हुऎ देखा
Posted by hemjyotsana "Deep" on March 9, 2009
मैने खुद को ही तबाह होते हुऎ देखा ,
जर्रे जर्रे में गुनाह होते हुऎ देखा ।
रग रग में लहू बन के जो दौड़ता था,
मैनें उसको भी स्याह होते हुऎ देखा ।
उचाँईयों से ना मेरा जिक्र करो ,
खुद को गर्दिश में पनाह होते हुऎ देखा ।
जो समझता था मुझे मुझसे ज्यादा ,
मैने उसको भी खफ़ा होते हुऎ देखा ।
गैरों की क्या बात करूँ तुमसे ,
मैनें अपने साये को जुदा होते हुऎ देखा ।














पवन चंदन said
एक बेहतरीन रचना
जो समझता था मुझे मुझसे ज्यादा ,
मैने उसको भी खफ़ा होते हुऎ देखा ।
शब्दों का चयन बेहद उम्दा
mahendra mishra said
bahut badhiya rachana .badhai.
समीर लाल said
होली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.
mehek said
जो समझता था मुझे मुझसे ज्यादा ,
मैने उसको भी खफ़ा होते हुऎ देखा ।
गैरों की क्या बात करूँ तुमसे ,
मैनें अपने साये को जुदा होते हुऎ देखा ।
waah bahut badhiya,ye dard kyun hainazmo mein,deep teri roushani khilkhilane de,holi ki bahut badhai.
Pragya said
bhut badhiya rachna hem.
सुशील कुमार said
बहुत ही बेहतरीन रचना।
संगीता पुरी said
बहुत सुंदर … होली की ढेरो शुभकामनाएं।
Sanjay Grover said
मैं तो कहंूगा अब तक जो भी देखा उसे भूल जाईए और एक नई होली मेरा मतलब है जिंदगी शुरु कीजिए। होली मुबारक:)-
Rukhsana said
Behtreen !!!
har ek sher laajawaab
V said
awesome!
maine khud ko hi tabah hote huae dekha,
jare jare mein gunah hote huae dekha!
ab kisse duaein mangun,
maine khuda ka hi imaan badalte dekha!
V.