कल
Posted by Hem Jyotsana "Deep" on जनवरी 23, 2009
कल याद मेरी उसे रुला आई है ।
कल बात मेरी बिगड़ती बना आई है ।
कल शाम सुबह सा मन्ज़र कर ,
कल रात मेरी पतझड़ बहार आई है ।
कल क्या था कुछ खास नहीं ,
कल शाख मेरी लहरा लहरा आई है ।
कल चुप चाप दबे पावं चला आया ,
कल आवाज़ मेरी वहाँ से आई है ।
कल-कल कल-कल कल बहता रहता था ,
कल नदिया मेरी साहिल बह कर आई है ।
कल याद मेरी ….
कल तुम जागे सोये से , बातों में खोये से ,
कल धूप मेरी छांव पर छाई है ।
कल इक दस्तक सी मौजूद रही ,
कल जिन्दगी मेरी चल के फ़िर आई है ।
कल कल था या ख्वाब कोई था ,
कल आंगन मेरी खुँशियाँ खुशबू छाई है ।
कल बुझा बुझा सा था “दीप “
कल रोशनी मेरी नये नूर नहाई है ।














sameer lal said
बढ़िया है. लिखते रहिये, शुभकामनाऐ.
विनय said
भावना का सागर, बहुत सुन्दर
—आपका हार्दिक स्वागत है
गुलाबी कोंपलें
mehek said
sach bhawnao ki ndai hi beh rahi hai,behad khubsurat.
महावीर शर्मा said
बहुत भावनापूर्ण रचना है।
SARWAR (S A ANSARI) said
Very impressive. Keep it up.
bharat said
kal kabhi nahi aata sir…
rajeev matwala said
Exilent……….