आफतों का शहर
Posted by Hem Jyotsana "Deep" on दिसम्बर 5, 2008
आफतों का ये शहर ,
रन्जिश है हवाऒं में ,
गुलशनों में भी सिर्फ धोखे है ,
फ़ुल दिखता है जो ,
पत्थर सी चोट देता है ।
राहे अपनी सी लगती हैं ,
मन्जिलें अपनी है कहाँ ।
मन्दिरों-मस्जिदों में भी जाकर देखा ,
कारोबार है सब ,धर्म दर्द बहुत देता है ।
कई चाँद सूरज है ,
फ़िर भी सुकून की रोशनी नहीं ,
भीड़ अपनों सी है मगर ,
जख्म गहरा अपना ही देता हैं ।














alok singh "sahil" said
wow! behad marmik.dil ko chhu gai.
ALOK SINGH “SAHIL”
Sangeeta said
अच्छा लिखती हैं लेखते रहें
हिमांशु said
मन्दिरों-मस्जिदों में भी जाकर देखा ,
कारोबार है सब ,धर्म दर्द बहुत देता है ।
पूरा सच कह दिया आपने. रचना के लिए आभार
sameer lal said
Behtarin Rachna-ekdam satik.
mehek said
bahut hi sahi aur sach likha hai,aaj aisa hi manzar dekhne milta hai.
dr ashok priyaranjan said
बहुत अच्छी रचना है आपकी । भाव की प्रखर अिभव्यिक्त है । मैने अपने ब्लाग पर एक लेख- उदूॆ की जमीन से फूटी िहंदी गजल की काव्यधारा- िलखा हैं । समय हो तो पढें और प्रितकिर्या भी दें -
http://www.ashokvichar.blogspot.com
Sharad chaturvedi said
AAPki Kavita Bahut Achhi Hay.