लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

रुह-ओ-जान हो गया है

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on अगस्त 12, 2008

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हमे वो मिला था युँ ही दोस्त बन के ,
घडी दो घडी में ये क्या हो गया है ,
कदम दो कदम साथ उसके चला तो ,
लगा रास्ता खुद मन्ज़िल हो गया है ,
भटकता रहा था युँ ही बेवजह मैं ,
मुझे क्या खबर, मेरा भी आशियांन हो गया है ,
कोई तो है जिसका मैं हो गया हूँ
कोई तो है जो बस मेरा हो गया है
ना अफसोस कोई ना कोई शिकायत ,
ना जख्मो की चिन्ता , ना कोई बगावत
ना उलझन कोई ना कोई है तुफान
तस्ववर में बनती है तस्वीर कोई
ख्यालों में भी बस नजर आये वो ही
था दिल की धडकन अब रुह-ओ-जान हो गया है
हर एक लम्हें जो साथ उसके बिताये
हर पल में हमको वो है याद आये
वो लम्हें थे रोशन या था नूर उसका
थे दो वो समन्दर या थे नैन उसके
युँ ही हमने उसको कहा जिन्दगी था
वो कहते ही कहते खुदा हो गया है

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8 Responses to “रुह-ओ-जान हो गया है”

  1. Annapurna said

    वाह ! क्या बात है !!

  2. shayda7 said

    very nice.

  3. neeraj1950 said

    कदम दो कदम साथ उसके चला तो ,
    लगा रास्ता खुद मन्ज़िल हो गया है ,
    बहुत सुंदर रचना है आपकी…हर शब्द बहुत करीने से सजाया है आपने…भाव भी अद्भुत हैं…बधाई.
    नीरज

  4. sushil said

    बहुत खूब अति सुन्दर। पढते हुए ऐसा लगा जैसे कोई संगीत बज रहा हो।

  5. सुन्दर।

  6. वाह!!बहुत खूब!!

  7. बहुत बढिया

  8. surya said

    very beautiful

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