कभी कभी यूँ भी
Posted by Hem Jyotsana "Deep" on अगस्त 8, 2008
कुछ यूँ भी …..
1)
ना माथे पे शिकन कोई ,ना काधें झुके हुये ,
ना चेहरे पे झुर्रियाँ , ना थे घुटने मुड़े हुये ,
ये कौन शक्स था ,जो यहाँ से गुजरा था ,
जिसके बाल थे , 90 सावन से भीगे हुये ।
2)
सैयाद मुझे करलें पिंजरे में बन्द ,
आकाश से ज्यादा पिंजरा है जरुरतमन्द ,
आसमान में तो कितने पंक्षी हँसते गाते है ,
पिंजरा बेचारा सुनसान हैं पिंजरे में भी जान हैं ।
3)
अभी पुरा हुआ था एक कि एक और निकला ,
क्या कहूँ ,कैसे मेरे अरमानों का काफ़िला निकला ,
रोज माँगता हुँ कि बस एक और सपना सच करदे ,
भगवान भी कहता होगा मैं कितना झुठा निकला ।














neeraj1950 said
हमेशा की तरह…तीनो रचनाएँ बहुत सुंदर हैं….संवेदना को स्पर्श करती हुईं…
नीरज
महामंत्री-तस्लीम said
अच्छे कतात हैं। बहुत बहुत बधाई।
balkishan said
सुंदर और उम्दा..
बहुत खूब.
दिनेशराय द्विवेदी said
हेम जी, नमस्ते।
बहुत दिनों बाद आप की रचनाएँ पढ़ने को मिलीं। सुन्दर रचनाएँ हैं। हम भी आप के कोटा में ही हैं। कुछ और भी ब्लागर हैं। दो तो होमियोपैथ हैं। तलाश करें तो एक दो और हो जाएँगे। क्यों न एक दिन सब मिल लें?
sameerlal said
बहुत उम्दा,बधाई.
pallavi said
waah…teeno rachnaayen bahut umda.
महावीर said
‘कुछ यूं भी…’ में तो बहुत कुछ लिख दिया है. तीनों रचनाएँ अद्भुत और संवदनशील हैं, एक से एक बढ़कर. हाँ, एक कमी जरूर है – आजकल बहुत कम लिख रही हो, काफी दिनों तक ब्लॉग सोता हुआ सा लगता है.
बस, ‘लम्हे जिंदगी के’ यहाँ ब्लॉग पर रचनाओं द्वारा प्रकाशित रहिये.
Harish Verma said
wow.. really great!!!!
apporv dadhich said
Bahut sundar…..first waali The best……
avinash said
bahut achchhe hai teeno hi