लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

लो अब उठता हूँ , लो अब जाऊँ

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on जुलाई 31, 2008

कुछ कर्ज लिये थे दे जाऊँ ,

कुछ अश्क मिले थे पी जाऊँ ,

मैंने भी पाया ज़ख्म यहाँ पर ,

औरों को भी कुछ दे जाऊँ ,

ना लाया था कुछ , ना ले जाऊँ ,

लो अब उठता हूँ , लो अब जाऊँ ,

इस मोह से बन्धन टुटा पर ,

इस माया से कैसे मुक्ति पाऊँ ?

सागर से बिछडा़ दरिया हूँ ,

काश कहीं पर फ़िर मिल जाऊँ ,

बादल ने चुराया जिस धरा का पानी ,

उस धरा को आज भिगो जाऊँ ।

ना लाया था कुछ , ना ले जाऊँ ,

लो अब उठता हूँ , लो अब जाऊँ ,

इस मोह से बन्धन टुटा पर ,

इस माया से कैसे मुक्ति पाऊँ ?

About these ads

10 Responses to “लो अब उठता हूँ , लो अब जाऊँ”

  1. mithilesh said

    अच्छी कविता, ऐसा लगा जैसे ये शब्द और ये भावनाएं मेरी हैं!

  2. Dr Anurag said

    bahut khoob….

  3. balkishan said

    बेहतरीन… बेहद उम्दा….
    अच्छा लिखतीं हैं आप.

  4. is mayaa se kaise mukti paaun.sunder

  5. neeraj1950 said

    माया से मुक्ति मिल जाए तो खुशियाँ भर जायें इंसान की झोली में…अच्छा लिखा है आपने.
    नीरज

  6. ये माया समझ न आई। लगता है। माया केवल एक काल्पनिक नाम है।

  7. विशिष्ट कविता!

  8. बहुत ही उम्दा

  9. viny said

    very stimulating.

  10. डा. रमा द्विवेदीsays:

    अच्छी अभिव्यक्ति है….बधाई…

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Connecting to %s

 
Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

%d bloggers like this: