लो अब उठता हूँ , लो अब जाऊँ
Posted by Hem Jyotsana "Deep" on जुलाई 31, 2008
कुछ कर्ज लिये थे दे जाऊँ ,
कुछ अश्क मिले थे पी जाऊँ ,
मैंने भी पाया ज़ख्म यहाँ पर ,
औरों को भी कुछ दे जाऊँ ,
ना लाया था कुछ , ना ले जाऊँ ,
लो अब उठता हूँ , लो अब जाऊँ ,
इस मोह से बन्धन टुटा पर ,
इस माया से कैसे मुक्ति पाऊँ ?
सागर से बिछडा़ दरिया हूँ ,
काश कहीं पर फ़िर मिल जाऊँ ,
बादल ने चुराया जिस धरा का पानी ,
उस धरा को आज भिगो जाऊँ ।
ना लाया था कुछ , ना ले जाऊँ ,
लो अब उठता हूँ , लो अब जाऊँ ,
इस मोह से बन्धन टुटा पर ,
इस माया से कैसे मुक्ति पाऊँ ?














mithilesh said
अच्छी कविता, ऐसा लगा जैसे ये शब्द और ये भावनाएं मेरी हैं!
Dr Anurag said
bahut khoob….
balkishan said
बेहतरीन… बेहद उम्दा….
अच्छा लिखतीं हैं आप.
anil pusadkar said
is mayaa se kaise mukti paaun.sunder
neeraj1950 said
माया से मुक्ति मिल जाए तो खुशियाँ भर जायें इंसान की झोली में…अच्छा लिखा है आपने.
नीरज
दिनेशराय द्विवेदी said
ये माया समझ न आई। लगता है। माया केवल एक काल्पनिक नाम है।
विनय प्रजापति said
विशिष्ट कविता!
Rajesh Roshan said
बहुत ही उम्दा
viny said
very stimulating.
ramadwivedi said
डा. रमा द्विवेदीsays:
अच्छी अभिव्यक्ति है….बधाई…