मुसीबतें हमें पाल लेती है
Posted by Hem Jyotsana "Deep" on जुलाई 7, 2008
कलम जब जब रोती है ,
शब्दों की शक्ल लेती है ।
अश्कों की स्याही , अश्को की स्याही ,
किताब के दामन में सोती है ।
जख्म लगाती है इक हाथ से ,
दुजे से जिन्दगी मरहम देती है ।
बिखर जाता हूँ तेरी कमी में ,
तेरी यादें मुझे थाम लेती है ।
रात चढ़ती है सहर बनने को ,
स्याह स्याही खूनी आंचल दाल लेती है ।
यूँ तो दवा दारू नहीं करते हैं हमसफर
लेकिन मुसीबतें हमें पाल लेती है ।
बरसों की दुरियाँ हैं बाकी ,तेरी निगाहें
मेरी हसीं का धोखा जान लेती है ।
चल दीप के महफ़िल में तेरा काम क्या ?
यहाँ की रंगीनियां अन्धेरो से काम लेती है ।














rachna said
very god poem
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Shubhashish Pandey said
यूँ तो दवा दारू नहीं करते हैं हमसफर
लेकिन मुसीबतें हमें पाल लेती है ।
बरसों की दुरियाँ हैं बाकी ,तेरी निगाहें
मेरी हसीं का धोखा जान लेती है ।
चल दीप के महफ़िल में तेरा काम क्या ?
यहाँ की रंगीनियां अन्धेरो से काम लेती है ।
kya baat hai
bahut khoob
समीर लाल said
बिखर जाता हूँ तेरी कमी में ,
तेरी यादें मुझे थाम लेती है ।
-बहुत उम्दा.
anil pusadkar said
yahan ki ranginiyan andheron se kam leti hai…………..kya kehne
suruchi said
perfect………………………….
aur kuchh bhi likhun kya……………..
bahut dino baad koi kavita samajh aaai……..
satyendra said
very good poem
sunita said
बिखर जाती हूँ तेरी कमी में ,
तेरी यादें मुझे थाम लेती है ।
bahut gahrai ki baat hai.