Posted by hemjyotsana "Deep" on June 30, 2008
बात नहीं करनी ना करना तुम ,
फासला मगर ना करना तुम ,
खाक होने से पहले जो पुकारूँ नाम ,
सुन के अनसुना ना करना तुम ,
वक्त की धारा में बिछड़े हैं हम ,
मिले तो किनारा ना करना तुम ,
तन्हाई का शिकार हूँ मैं -तुम भी ,
तन्हा को और तन्हा ना करना तुम ,
दुर रह कर भी अपनी सी लगती हो ,
पास आकर अजनबी ना करना तुम ,
सहारा नहीं मांगा हैं तुमसे मगर ,
मझधार में बेसहारा ना करना तुम ,
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Posted by hemjyotsana "Deep" on June 26, 2008
मेरे मरने की दुआ मांगे हैं , ज़माने वाले ।
दर पे देते हैं दस्तक मेरे , चोट लगाने वाले ।
प्यार से बात करके , हँस के गले मिलते हैं ,
खंजर मेरी पीठ में चुपके से घुसाना वाले ।
जिन्दगी में हंसाती थी , रुलाती है वही बात ,
धोखा देते हैं , ये रिश्तों को बनाने वाले ।
कसमें खाते हैं वादे करते हैं , निभाते हैं कहाँ ,
छोड़ जाते हैं , तन्हा साथ निभाने वाले ।
दूर तक जब अन्धेरे नजर आते हैं ,
रोशनी करते हैं दिल जला के , दिल जलाने वाले ।
कोई अपना भी है दिखता ही नहीं ,
आँखों में दिखते हैं सभी गैर जमाने वाले ।
मुझे गिरना है फ़िर गिर के खडा़ होना है ,
इसे बनना हैं फ़िर बनके तबाह होना हैं ,
मेरी आँखों के हर सपने को फ़ना होना है,
तोड़ते हैं सपना , खुद सपना दिखाने वाले ।
अब ना होगी मेरी मुलाकात तुझसे कभी ,
तोड़ जाउँगा में रिश्ते नाते यहाँ पे सभी ,
छोड़ जाऊँगा तुझे दे के दिलासे झुठे ,
याद आऊँगा बहुत ओ- मुझको भुलाने वाले ।
मैं ना रुठा हूँ ना रुठूँगा कभी ,
मेरे साथ यहीं करते हैं सभी ,
अब ना देर कर , अब ना पछता ,
अब “दीप” जला भी ले , दीप बुझाने वाले ।
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Posted by hemjyotsana "Deep" on June 23, 2008
धन है तो मन है ,
ज्ञान है तो सम्मान है ,
चरित्र है तो इन्सान है ,
नहीं है असत्य तो ड़र भी नहीं है ।
जिसमें है ये सभी , वही तो महान है, वही तो महान है ।
अहिंसा बिन मानव नहीं ,
प्यार बिन मानव नहीं ,
आत्मा बिन मानव नहीं ,
वह तो पशु समान है ,
जिसमें है ये सभी , वही तो महान है, वही तो महान है ।
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यह कविता मेरी पहली कविता है , जो मैंने कक्षा 11 (1999) में लिखी थी ।
इस कविता को मैंने एक व्यक्ति विशेष पर , उनके व्यवहार पर लिखी थी |
जब मैंने इसे अपनी English Teacher को सुनाया था तब उन्होने इसमें एक परिवर्तन करवाया था ।
मैंने इसमें महान शब्द के स्थान पर भगवान शब्द लिखा जिसे मेरी Fav English Teacher ने यक कह कर हटवाया के भगवान की ये परिभाषा नहीं हैं ।
और तब से मैंने शब्दो का सही प्रयोग करना सीखा ।
हिन्द-युग्म के काव्य-पल्लवन के विषय ” पहली कविता ” में प्रकाशित हुई थी ।
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Posted by hemjyotsana "Deep" on June 18, 2008
अश्कों के वस्त्रों को त्याग ,
मुस्कान पहन कर देख ज़रा।
दर्द के सायों में ,
कांटों के हारों में ,
धुमिल जस्बातों में ,
यादों की सौगातों में ,
अश्कों के वस्त्रों को त्याग ,
मुस्कान पहन कर देख ज़रा।
ज़ख्मी हालातों में ,
तन्हाई के सवालातों में ,
रुखसत की उन रातों में ,
ख्वाबों के बिखरे टुकडों में ,
अश्कों के वस्त्रों को त्याग ,
मुस्कान पहन कर देख ज़रा।
टुटे कस्में-वादों में ,
गर्दिश के नजारों में ,
पतझड़ की सी बहारों में ,
टुटे हुऎ सहारों में ,
अश्कों के वस्त्रों को त्याग ,
मुस्कान पहन कर देख ज़रा।
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