एक मैं और एक मैं
Posted by hemjyotsana "Deep" on April 24, 2008
एक “मैं ” ….. “और एक मैं “…..
एक “मैं ” मालिक मासूम बचपन का
“और एक मैं “…. दौड़ती भागती राहों का राही |
एक “मैं ” जो बेखौफ़ मुस्कुराता ,
“और एक मैं “…. खोज में खुशियों के ,भीड़ में खो जाता |
एक “मैं” जो दीवारों से बेख़बर ,हर घर में जाता ,
” और एक मैं ” …. अपने मकान के वजूद के सपने को तरस जाता |
एक ” मैं ” झूठ सच से परे , मुस्कान लुटाता ,
“और एक मैं” … अपनी बातों में औरों को घुमाते-२ ,खुद घूम जाता |
एक “मैं ” माँ की गोद में महफूज सोता ,
“और एक मैं ” … अपनी चोटों पर खुद मरहम लगाता |
एक “मैं ” से इस….. ” और एक मैं ” के सफ़र में …..
जिंदगी की बहारें ना जाने कब पतझड़ बन गई |
कली खिली भी , पर खुशबू ना हुई |
एक “मैं ” से “और एक मैं” के बीच में ,
काश कभी खुद को “हम” में तलाशा होता |
तो आज यूँ “मैं “….. “और एक मैं ” ना होता |






April 24, 2008 at 5:48 pm
काश कभी खुद को “हम” में तलाशा होता |
wah! ek naya aur sunder bhav, badhai ho
April 24, 2008 at 6:13 pm
Uttam!!!
April 24, 2008 at 6:59 pm
सुदर कवित. बधाई.
April 24, 2008 at 7:01 pm
एक मैं अपने आज को देखकर..
एक मैं अपनी नाकामियों पर रो रहा होता..
April 24, 2008 at 7:02 pm
http://indianwomanhasarrived2.blogspot.com/
April 24, 2008 at 7:22 pm
आज ज्यादातर लोग (मैं भी) दोहरे चरित्र के साथ जीते हैं। कभी-कभी ये चरित्र मौलिक होते हैं तो कभी-कभी हम इसे हालातवश खुद के अंदर पनपने का मौका देते हैं। कभी ये बेहद मासूम होते हैं तो कभी बेहद घाघ। आपने इन सभी पहलुओं को एक सुंदर रचना द्वारा एक-दूसरे से पिरोया है। बधाई।
April 25, 2008 at 12:32 am
यह मैं ही तो है, सब जगह। इस के सिवा कुछ नहीं। लगता है गीता बाँच दी है, आपने।
April 25, 2008 at 8:25 pm
bahut sundar