एक मैं और एक मैं
Posted by Hem Jyotsana "Deep" on अप्रैल 24, 2008
एक “मैं ” ….. “और एक मैं “…..
एक “मैं ” मालिक मासूम बचपन का
“और एक मैं “…. दौड़ती भागती राहों का राही |
एक “मैं ” जो बेखौफ़ मुस्कुराता ,
“और एक मैं “…. खोज में खुशियों के ,भीड़ में खो जाता |
एक “मैं” जो दीवारों से बेख़बर ,हर घर में जाता ,
” और एक मैं ” …. अपने मकान के वजूद के सपने को तरस जाता |
एक ” मैं ” झूठ सच से परे , मुस्कान लुटाता ,
“और एक मैं” … अपनी बातों में औरों को घुमाते-२ ,खुद घूम जाता |
एक “मैं ” माँ की गोद में महफूज सोता ,
“और एक मैं ” … अपनी चोटों पर खुद मरहम लगाता |
एक “मैं ” से इस….. ” और एक मैं ” के सफ़र में …..
जिंदगी की बहारें ना जाने कब पतझड़ बन गई |
कली खिली भी , पर खुशबू ना हुई |
एक “मैं ” से “और एक मैं” के बीच में ,
काश कभी खुद को “हम” में तलाशा होता |
तो आज यूँ “मैं “….. “और एक मैं ” ना होता |














shubhashishpandey said
काश कभी खुद को “हम” में तलाशा होता |
wah! ek naya aur sunder bhav, badhai ho
Avinash said
Uttam!!!
Rajender Tyagi said
सुदर कवित. बधाई.
सागर नाहर said
एक मैं अपने आज को देखकर..
एक मैं अपनी नाकामियों पर रो रहा होता..
sambhavna saxena said
http://indianwomanhasarrived2.blogspot.com/
बिक्रम प्रताप सिंह said
आज ज्यादातर लोग (मैं भी) दोहरे चरित्र के साथ जीते हैं। कभी-कभी ये चरित्र मौलिक होते हैं तो कभी-कभी हम इसे हालातवश खुद के अंदर पनपने का मौका देते हैं। कभी ये बेहद मासूम होते हैं तो कभी बेहद घाघ। आपने इन सभी पहलुओं को एक सुंदर रचना द्वारा एक-दूसरे से पिरोया है। बधाई।
दिनेशराय द्विवेदी said
यह मैं ही तो है, सब जगह। इस के सिवा कुछ नहीं। लगता है गीता बाँच दी है, आपने।
mehhekk said
bahut sundar
sanjay sharma said
is duniyan mein aisi sundar kavita kebal tum likh sakti ho . aaj maine mujh ko jaana
महावीर said
एक “मैं ” से “और एक मैं” के बीच में ,
काश कभी खुद को “हम” में तलाशा होता
सारे दर्शन (फलसफे) इन पंक्तियों में समा गए। शब्द
नहीं मिल रहे कुछ कहने के लिए।
अति उत्तम!
साधुवाद!
महावीर
Gaurav Sangtani said
एक “मैं ” माँ की गोद में महफूज सोता ,
“और एक मैं ” … अपनी चोटों पर खुद मरहम लगाता |
Bahut khoob