लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

कुछ ना मिला

Posted by hemjyotsana "Deep" on March 10, 2008

इतने बडे अम्बर को हमने छू कर देखा कुछ ना मिला ,
दर्द भरे इस दिल में हमको गम के सिवा कुछ ना मिला ,
रोशनी भी चांद के हैं पास कहाँ ,वो तो मांगे सूरज से ,
सूरज बोला मेरे हाथ  भी , राख के सिवा कुछ ना मिला ।
कहते हैं जीवन को खेल धूप-छांव का ,
ऎसे भी इन्सान मिलें है , जिन्हे छाव भरा एक पल ना मिला ।

4 Responses to “कुछ ना मिला”

  1. R P Singh Says:

    “ऎसे भी इन्सान मिलें है , जिन्हे छाव भरा एक पल ना मिला ।”
    Ji han shayad yahi jindagi hai. Par ek katra bhi chhavan ka kisi ko koi de sake to jindagi ki ye badi khushi hogi

  2. paramjitbali Says:

    सुन्दर भावपूर्ण रचना है।

    ोशनी भी चांद के हैं पास कहाँ ,वो तो मांगे सूरज से ,
    सूरज बोला मेरे हाथ भी , राख के सिवा कुछ ना मिला ।

  3. mehek Says:

    कहते हैं जीवन को खेल धूप-छांव का ,
    ऎसे भी इन्सान मिलें है , जिन्हे छाव भरा एक पल ना मिला ।
    bahut gehri baat bahut sundar

  4. Deepu Biplab Kumar Says:

    Its nice poem,which touches hearts of every age .

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