उडती तितली की तरह
Posted by hemjyotsana "Deep" on March 4, 2008
उदास रात की कोई सुबह हसीन नहीं ।
नहीं आँसमां मेरा ,मॆरी कहीं ज़मीन नहीं ।
मैं खूशबू बन के हवा में नहीं बसती ,
मैं कोई किरणों की तरह भी महीन नहीं ।
मुझे ख्वाबों में मत तराश अभी ,
उडती तितली की तरह, मैं कोई रंगीन नहीं ।
छुप जाते हैं कभी-कभी , चाँद-तारे भी,
मेरा कत्ल ही हैं , ये गुनाह कोई संगीन नही ।
दफ़न कर या जला दे अब मुझको ,
ज़िस्म में रूह नहीं ,अब कोई तौहीन नहीं ।
भूला बैठा है , वो वेवफ़ा मुझको ,
मिला कहीं तो पह्चाने, इसका भी यकीन नहीं ।
बुझ गया ये “दीप” ,सुबह के सितारे के लिये ,
खुश हूँ मिट कर भी , मैं कोई गमगीन नहीं ।
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