लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

Archive for February 29th, 2008

वो दो आँखे ,वो मुस्कान

Posted by hemjyotsana "Deep" on February 29, 2008

wo do ankhe wo muskaan_1
मदमस्त हवा में मस्त हुआ मैं
लहरो सा उछल रहा था ।
कल जब अपने घर के बहार
राहों से य़ूँ ही गुजर रहा था ।

रंगीन नजारे आँखों में ,
भर भर के झूम रहा था ।
चल रहा था , उड रहा था ,
अपनी धुन मे, बादल चूम रहा था ।

पर जैसे सपनो की राहें ,
आगे जाके गुम हो जाती हैं ,
चलते चलते गुलशन नें ,
पतझड की दस्तक आती हैं

वो दो आँखें ,वो मुस्कान ,
हर ओर नजर मुझे आती हैं ।
एक ख्वाब है या कोई है हकीकत ,
रह रह कर दिल मेरा जलाती है ।

क्यूँ सुरज तब से हारा सा है ,
क्यूँ कमरा मेरा ठंडाया हैं ।
भरी दोपहरी में भी देखो ,
क्यूँ अंधियारा गहराया हैं ।

चकाचॊंध में मेहनत ,
गुमनाम नजर बस आती है
मन्दिर, मस्जिद ,घर ,दुकान की दुनिया ,
पत्थर पर पत्थर का ढेर नजर आती हैं ।

चार दिवारो का ये घर ,
क्य़ूँ मैदान नजर बस आता हैं ।
और फ़िर इन सब पर वो हंसता हैं ,
वो मासुम सा चेहरा मुस्काता हैं ।

वो बेखॊफ हंसी संग मेरे ,
घर तक मेरे चली आती है ।
खामोशी से ना जाने कितनी ,
अनकही ,अनचाही बातें सुनाती हैं ।

मैं बेटा हूँ जिसका ,
vo do aankhe vo muskaan_3वो इस घर को बनाने वाला है ।
उस घर को , वहाँ उस घर को भी ,
ये मस्जिद भी ,वो मन्दिर भी ,
उस गुरुदारे का दर भी बनाया है उसने ,
इस चर्च में काम भी वो ही करता है ।
वो बाप हैं मेरा ,
फिर भी मेरा , अपना , मेरी माँ का ,
मेरी बहनो का पेट नहीं भर पाता है ।
हर रात ,मैं जब सर्द हवा से लडता हूँ ,
अपनी माँ के फटे आँचल में छिपता हूँ ।
नीलगगन में भरी दोपहरी ,
जल जल के रोज बढता हूँ ।
तुम मोल भाव से पानी पीते हो ,
मैं रेत मिले पाती पर जीता हूँ ।
पिता मेरे हैं वो लेकिन ,
क्यूँ सेवा सबकी करते हैं ।
बदले में मिलती हैं बस लाचारी ,
बस गुमनामी ,थोडी मजदूरी ,
एक छत भी बना के
क्यूँ वो मुझको नहीं दे पाते है ।
सब के महल बनाते रहते हैं ।
कहने को तुम रहते हो ,
इस मकान को घर भी कहते हो ।
मैं मालिक हूँ इन सब का ,लेकिन ,
मेरे सपनो को तोडकर ,
मेरे बच्चपन को मोडकर ,
तुम क्युँ मुस्काते हो ?
देख कर मेरी हालत ,
तुम आगे बढ जाते हो ।……….

wo do ankhe wo muskaan_2

सुन सुन कर इतना सब ,
होश मेरा उड जाता है ।
सब रंग हवा हो जाते हैं ,
दिल मेरा भर आता हैं ।

गुमनाम नाम मेरे घर को बनाने वाले का ,
याद जब मुझे नहीं आता हैं ।
फ़िर क्यों मेरे सपने को पुरा करने में ,
दिन रात वो क्यूँ लग जाता हैं ?

वो चेहरा कभी नहीं कुछ बोला ,      
पर रह रह के मुझे हकीकत दिखलाता हैं ।
मेरे देश का आने वाला कल
वो बच्चा ,मिट्टी में लिपटा दिखता है ।

.
वो दो आँखे ,वो मुस्कान ,
मुझे हर रोज सताती हैं ।
मेरे घर के आइने में ,
मुजरिम सा मुझे कह जाती हैं ।

Posted in 15-Aug, 26-jan, Blogroll, bharat, hemjyotsana, hindi, india, jagat, jeev, jhonpde, kavita, poems, जिन्दगी, भारतीये | Tagged: , , , , , , | 8 Comments »