लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

कविता हूँ मैं

Posted by hemjyotsana "Deep" on February 27, 2008

हंसी खुशी ,रिश्ते नाते ,एहसास दोस्ती से मिल कर बनी कविता हूँ मैं ,

जो अपनी होकर भी , बुरी लगे , एक ऎसी ही अजीब दुविधा हूँ मैं ,

अशोक के गर्म खून सी, बौध्द शान्ति में पली , गुमनाम संगमित्रा हूँ मैं ,

शब्द से निर्मित हूँ , शब्द अन्त है मेरा ,

मुक्त छोड दो तो खो जाती हूँ , हर बार बाधंनी जो पडे , एक ऎसी भुमिका हुँ मैं ।

हुनर जिसका भीड में नजर आता है , वो एक छोटी सी कणिका हूँ मैं ।

जिसके दामन में अश्क गिर के सोते है ,शायद ऎसी एक अंकिता हूँ मैं ।

जिन्दगी के  रंगो से भरी , जख्मो से हर बार सजी ,

खुद से मिल खुद खो जाने वाली  , एक अनजान चित्रा हूँ मैं ।

8 Responses to “कविता हूँ मैं”

  1. rajni bhargava Says:

    आपकी कविता बहुत अच्छी लगी.

  2. omesh meena Says:

    ऐसा लगता हैं मानों कवियित्री ने समय के समानांतर यात्रा की हो | इतिहास, संस्कृति और संवेदनाओ को चंद पंक्तियों में बहुत खूब व्यक्त किया हैं |यही कविता का सही मर्म हैं |

  3. mehek Says:

    bahut sundar hai hem ji,har shabdh jaise khud ko pehchankar bhi anjana sa lagat hai,
    अशोक के गर्म खून सी, बौध्द शान्ति में पली , गुमनाम संगमित्रा हूँ मैं ,
    this is fantastic.
    mitkar bhi na jo mit payi,aisi hi asmita hun mai.

  4. Pragya Says:

    hem………… atisundar rachna hai……….

  5. Amit Says:

    “जिन्दगी के रंगो से भरी , जख्मो से हर बार सजी , खुद से मिल खुद खो जाने वाली , एक अनजान चित्रा हूँ मैं ।”
    बहुत ही प्यारी पंक्तियाँ हैं , हेम |

  6. sanghmitra singh Says:

    yaar , i dont have that talent to access your talent, but i just feel it’s superb.
    keep it up hems

  7. समीर लाल Says:

    जो अपनी होकर भी , बुरी लगे , एक ऎसी ही अजीब दुविधा हूँ मैं ,

    –उत्तम भाव.

  8. puja jaiswal Says:

    aap ki kavita me ghrai hai
    dil ko chune wali hai ye.

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