कविता हूँ मैं
Posted by hemjyotsana "Deep" on February 27, 2008
हंसी खुशी ,रिश्ते नाते ,एहसास दोस्ती से मिल कर बनी कविता हूँ मैं ,
जो अपनी होकर भी , बुरी लगे , एक ऎसी ही अजीब दुविधा हूँ मैं ,
अशोक के गर्म खून सी, बौध्द शान्ति में पली , गुमनाम संगमित्रा हूँ मैं ,
शब्द से निर्मित हूँ , शब्द अन्त है मेरा ,
मुक्त छोड दो तो खो जाती हूँ , हर बार बाधंनी जो पडे , एक ऎसी भुमिका हुँ मैं ।
हुनर जिसका भीड में नजर आता है , वो एक छोटी सी कणिका हूँ मैं ।
जिसके दामन में अश्क गिर के सोते है ,शायद ऎसी एक अंकिता हूँ मैं ।
जिन्दगी के रंगो से भरी , जख्मो से हर बार सजी ,
खुद से मिल खुद खो जाने वाली , एक अनजान चित्रा हूँ मैं ।






February 18, 2008 at 9:13 am
आपकी कविता बहुत अच्छी लगी.
February 19, 2008 at 5:12 am
ऐसा लगता हैं मानों कवियित्री ने समय के समानांतर यात्रा की हो | इतिहास, संस्कृति और संवेदनाओ को चंद पंक्तियों में बहुत खूब व्यक्त किया हैं |यही कविता का सही मर्म हैं |
February 19, 2008 at 12:07 pm
bahut sundar hai hem ji,har shabdh jaise khud ko pehchankar bhi anjana sa lagat hai,
अशोक के गर्म खून सी, बौध्द शान्ति में पली , गुमनाम संगमित्रा हूँ मैं ,
this is fantastic.
mitkar bhi na jo mit payi,aisi hi asmita hun mai.
February 20, 2008 at 3:23 am
hem………… atisundar rachna hai……….
February 21, 2008 at 11:18 am
“जिन्दगी के रंगो से भरी , जख्मो से हर बार सजी , खुद से मिल खुद खो जाने वाली , एक अनजान चित्रा हूँ मैं ।”
बहुत ही प्यारी पंक्तियाँ हैं , हेम |
February 25, 2008 at 5:53 am
yaar , i dont have that talent to access your talent, but i just feel it’s superb.
keep it up hems
February 27, 2008 at 7:09 am
जो अपनी होकर भी , बुरी लगे , एक ऎसी ही अजीब दुविधा हूँ मैं ,
–उत्तम भाव.
May 10, 2008 at 12:25 am
aap ki kavita me ghrai hai
dil ko chune wali hai ye.