हम वो राही हैं जिन्हे
Posted by hemjyotsana "Deep" on February 27, 2008
हर बात को कहने के लिए जुबां की ज़रूरत नहीं होती
हम वो राही हैं जिन्हे
मंज़िल के लिए कारवाँ की ज़रूरत नहीं होती |
कौन हो तुम ,जिससे कहने के लिए भूमिका की ज़रूरत नहीं होती |
विश्वास रिश्तों पर हो तो काफ़ी हैं ,
दोस्त को परखने के लिए इम्तहान की ज़रूरत नहीं होती |
सुनता हैं खुदा सबकी , किसी किसी को दुआ की ज़रूरत नहीं होती |
बसा करते हैं यादों के मंदिर में ,उन्हे मकान की ज़रूरत नहीं होती |
तुम तो आवाज़ से पहचान लेते हो ,
तेरे आगे बेवजह मुस्कुराने की ज़रूरत नहीं होती |
खुशियाँ लिए बैठे रहते हैं ,पर रोने के लिए बहाने की ज़रूरत नहीं होती |
क्या बात हैं इस रिश्ते में ,दोस्त के मिलने पर जमाने की ज़रूरत नहीं होती |
जिंदगी में ही जो मरते हैं हर पल के साथ,
उन्हे मौत से मिल के मरने की ज़रूरत नहीं होती |
एहसास आँखो से बात करते तो ,दीप को कविता की ज़रूरत नहीं होती | नाव सुरक्षित हैं किनारे पर ,पर इसे लहरो से लड़ना सीखने की ज़रूरत नहीं होती |
बनाने वाला जब खुदा है तो मिट नहीं सकते ,
जिसे रोशन करती हैं हवा , उस दीप को बचाने की ज़रूरत नहीं होती |






February 27, 2008 at 3:18 am
pada to bahut achcha laga.. ek smile ke saath do baatein yaad aa gayi padte hi..
परखना मत की परखने से कोई अपना नहीं रहता..
फानूस बन के जिसकी हिफाज़त हवा करे, वो “दीप” क्या बुझे जिसे रोशन खुदा करे..
bahut hi achchi kavita hai… aise hi likhte rahein..
February 27, 2008 at 1:29 pm
jyotsna jee,
shubh sneh. aapko kuchh samay pehle hee padhnaa shooroo kiya hai . mujhe kshushi hai ki aap apne naam ke anuroop jyotsna failaa rahee hain. likhatee rahein.
February 27, 2008 at 2:00 pm
कुछ रचनाएं ऐसी होती है जिन्हें तारीफ़ की ज़रूरत नहीं होती
कुछ चिट्ठे ऐसे होते है जिन पर नियमित टिप्पणी देने की ज़रूरत नहीं होती
February 27, 2008 at 2:08 pm
सुन्दर!
घुघूती बासूती
February 27, 2008 at 3:34 pm
kavita men baaton ka rang ghul jaaye, to usse nikalti hai batkahee, jo ancheenhi-anjaani si kahan rah jaati hai. aapmen ek kashish hai, jo hina ki tarah ek din rang laayegi jaroor.
February 27, 2008 at 5:07 pm
सुनता हैं खुदा सबकी , किसी किसी को दुआ की ज़रूरत नहीं होती |
एहसास आँखो से बात करते तो ,दीप को कविता की ज़रूरत नहीं होती | नाव सुरक्षित हैं किनारे पर ,पर इसे लहरो से लड़ना सीखने की ज़रूरत नहीं होती |
बनाने वाला जब खुदा है तो मिट नहीं सकते ,
जिसे रोशन करती हैं हवा , उस दीप को बचाने की ज़रूरत नहीं होती |
ab puri kavita hi comment mein copypaste kare,bahut sundar,khas kar aakhari wali lines,awesome,
February 27, 2008 at 7:00 pm
बढिया ।
आपकी लेखनी दिनबदिन और धार पाए ।
शुभकामनाएँ ..
February 27, 2008 at 8:38 pm
हेम ज्योत्सना पाराशर’दीप’ जी सादर नमस्कार, आपकी सुँदर रचना ‘हम वो राही हैँ जिन्हेँ.. दिल को छू गया। हेम जड़ित शब्दोँ की ज्योत्सना से मन मुदित व प्रफुल्लित हो गया। सुनते हैँ खुदा सबकी किसी को किसी की दुआओँ की जरुरत नहीँ होती। बसा करते हैँ यादोँ मेँ उन्हेँ मँदिर मेँ मकान की जरुरत नहीँ होती।कमाल की लेखनी है आपकी बस ऐसे ही लिखते रहिए। मैँ अकेला ही चला था ज़ानिबे मँजिल लोग मिलते गए कारवाँ बन गया।