ब्लोग की दुनिया में अब एक नया नाम जुडा है रोहित जैन बहुत ही अच्छी गज़ले लिखते हैं रोहित जी ।मैनें सबसे पहले PDJS पर पढा था ।
बन के लकीर हर इक, हाथों में आ बसा हैं2)
दिल के तलबखाने में आज कैसी शकेबाई सी है
कोई साज़ नहीं है कानों में शहनाई सी है
हाय तमाशा क्या लगा है मेरे दिल के आस पास
सुरूर-ए-कैफ़ की बारिश है और तन्हाई सी है
3)
काटे हैं इन्सान ने दिल की रगों से खंजर कई
दिल की हिम्मत से सुनो झुक जाते हैं लश्कर कई
4)
दिल जला उस की तस्वीर जल गई होगी
इश्क़ की आखरी तहरीर जल गई होगी
5)
चराग-ए-सोज़-ए-ग़म ‘रोहित‘ बुझ ना जाये कहीं
इस नूर से ही ज़िंदगी मैने ये सजाई सी है
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रोहित जी आपका बहुत बहुत स्वागत है । आप लिखते रहे और हम सब को पढने को अच्छी गज़ले मिलती रहे ।













