दीप कहाँ है तू ?
Posted by hemjyotsana "Deep" on January 7, 2008
आती है पश्चिम से ये तूफ़ानी हवाएँ ,
घनघोर अंधेरा , छत पर आकर बादल लाएँ ,
मेरे कमरे को रोशन करता , दीप कहाँ है तू ?
गरज गरज कर बादल बरसे ,
बन्द दरवाजे पर देती दस्तक हवाएँ ,
कमरे में घुसने को आतुर ठंडी हवाएँ ,
डरा हुआ सहमा सा ,
कोने से ही देख रहा हूँ कमरा अंधियारा ,
अब तक तेरा साथ रहा है , तो तू बिछड़ा क्यूँ ?
दीप कहाँ है तू ?
चारों ओर है दबी दबी आवाज़े ,
कानो में अनचाहा अनकहा कह जाती हवाएँ ,
तूफ़ानो से तू लड़ता था जब ,
देखा करता था तुझको मैं ,
देख देख सीखा तुझसे , फिर तू बिछड़ा क्यूँ ?
दीप कहाँ है तू ?
अब फिर आकर रोशन हो जा ,
थका हुआ डरा हुआ सा ,
मैं बस तुझको ढूंढूं रहा हूँ ,
दीप कहाँ है तू ?
थक हार के जब बैठा पलभर ,
पलक करी जब बन्द पलभर ,
झिलमिल तुझको मन के अंदर रोशन पाया ,
भूल गया मैं , मेरे जीवन का दीप यहाँ है तू |






January 7, 2008 at 12:51 pm
hem sahi akhri lines behad sundar hai,thak kar jab baitha pal bhar,bhul gaya mere andar roushan hai tu.so true,the light of oue life is within us inside the soul,and we search it in darkness.fantastic theme of this deep kaha hai tu,and facinating lines.
January 7, 2008 at 2:08 pm
बहुत दिन बाद मैं आपके चिट्ठे पर आई। अच्छी लगी कविता। शुरू में एक सीधी-सादी सी कविता लगी पर अंत तक आते-आते स्तर उठा दिया आपने।
लिखते रहिए ऐसे ही…
शुभकामनाएं !
January 7, 2008 at 4:39 pm
थक हार के जब बैठा पलभर ,
पलक करी जब बन्द पलभर ,
झिलमिल तुझको मन के अंदर रोशन पाया ,
भूल गया मैं , मेरे जीवन का दीप यहाँ है तू |
बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति है…
January 7, 2008 at 4:46 pm
बहुत अच्छी रचना है।बधाई स्वीकारें।
थक हार के जब बैठा पलभर ,
पलक करी जब बन्द पलभर ,
झिलमिल तुझको मन के अंदर रोशन पाया ,
भूल गया मैं , मेरे जीवन का दीप यहाँ है तू |
January 8, 2008 at 2:07 am
सुन्दर भाव सुन्दर अभिव्यक्ति !
घुघूती बासूती
January 10, 2008 at 6:20 pm
फिर एक सुंदर अभिव्यक्ति …. मन का दीप जले ।
January 12, 2008 at 4:39 pm
सृजन-सम्मान द्वारा आयोजित सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक ब्लॉग पुरस्कारों की घोषणा की रेटिंग लिस्ट में आपका ब्लाग देख कर खुशी हुई। बधाई स्वीकारें।