Posted by hemjyotsana "Deep" on January 16, 2008
आँगन की तपती दोपहरी में ,
खाट के जैसे तपता सा
अपनो के चेहरो में ही ,
अपनो की राहें तकता सा |
चेहरे की झुर्री में
मुस्कान कहीं गुम हो जाती ,
तन्हाई में यादों की ,
बातें पुरानी रटता सा |
इस गली से उस मोड़ तक
नज़रे जा-जा कर आती ,
हाथ में लाठी ,बैठ बगीचे में ,
सुख-दुख के पंखे झलता सा |
अपने ही क़िस्सों की कहानी
बुन-बुन कर ,सबको सुनता ,
देख चुका जीवन के सब रंग ,
बन बैठा अब पतझड़ सा |
चकाचोंध से घर में दिवाली
होती है अक्सर अब तो ,
बेबसी में बेवजह ,बाम पे रखा ,
“दीप” कोई हैं जलता सा |
meri nanijee ko meri taraf se ye kavitaanjali
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Posted by hemjyotsana "Deep" on January 16, 2008
बहुत दु:ख के साथ सूचित कर रही हूं कि मेरी अम्मा ( नानी ) का शनिवार रात्रि 12 जनवरी 2008 , देहांत हो गया |
उनका जन्म july, 1919 में हुआ था |
भगवान उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करें।
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Posted by hemjyotsana "Deep" on January 14, 2008
मैने ब्लॉग लिखना March 2007 में शुरू किया था |
अब तक 54 पोस्ट की हैं और 347 प्रतिक्रिया मिली हैं |
ब्लॉग लिखने के बाद मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला , कई गुरु मिले | mahavir sir , devi naangrani ma‘am , rama ma‘am …… आप सभी की मैं बहुत बहुत आभारी हूँ |
total hit 19,000 ,post 54 ,comments 331… excluded my comments 16 , total comments 347 ,
एवं सभी पढ़ने वालो , प्रतिक्रिया देने वालो , मेरी कमज़ोरियों मुझे बताने वालो की मैं बहुत आभारी हूँ |आशा है आप सभी का सहयोग मुझे आगे भी मिलता रहेगा |
सादर प्रणाम
हेम ज्योत्स्ना पाराशर “दीप “
लम्हे जिंदगी के
http://hemjyotsana.wordpress.com
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Posted by hemjyotsana "Deep" on January 14, 2008
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Posted by hemjyotsana "Deep" on January 7, 2008
आती है पश्चिम से ये तूफ़ानी हवाएँ ,
घनघोर अंधेरा , छत पर आकर बादल लाएँ ,
मेरे कमरे को रोशन करता , दीप कहाँ है तू ?
गरज गरज कर बादल बरसे ,
बन्द दरवाजे पर देती दस्तक हवाएँ ,
कमरे में घुसने को आतुर ठंडी हवाएँ ,
डरा हुआ सहमा सा ,
कोने से ही देख रहा हूँ कमरा अंधियारा ,
अब तक तेरा साथ रहा है , तो तू बिछड़ा क्यूँ ?
दीप कहाँ है तू ?
चारों ओर है दबी दबी आवाज़े ,
कानो में अनचाहा अनकहा कह जाती हवाएँ ,
तूफ़ानो से तू लड़ता था जब ,
देखा करता था तुझको मैं ,
देख देख सीखा तुझसे , फिर तू बिछड़ा क्यूँ ?
दीप कहाँ है तू ?
अब फिर आकर रोशन हो जा ,
थका हुआ डरा हुआ सा ,
मैं बस तुझको ढूंढूं रहा हूँ ,
दीप कहाँ है तू ?
थक हार के जब बैठा पलभर ,
पलक करी जब बन्द पलभर ,
झिलमिल तुझको मन के अंदर रोशन पाया ,
भूल गया मैं , मेरे जीवन का दीप यहाँ है तू |
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Posted by hemjyotsana "Deep" on January 2, 2008
जो गम देके तुमने सिखाया हमें ।
जिन्दगी में बहुत काम आया हमें ।
जब लगी ठोकर , गिर के बैठ गये ,
तब लगा पास तुमने बिठाया हमें ।
गुजर जाते बरसो मगर ना समझते ,
चन्द लम्हों में तुमने समझाया हमें ।
हे वही फिर भी, नई सी लगी ,
जाने कैसे दुनिया को तुमने दिखाया हमें ।
जो हुऐ हम परेशां , कहीं पे कभी ,
आ-आ के यादों में बहुत बहलाया हमें।
कभी जब लगा रुठे बैठे हैं हम ,
तो बहुत खूब तुमने मनाया हमें ।
जानते थे हम भी कुछ मगर ,
लगा जैसे सब तुम्ही ने बताया हमे ।
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