चजइ - बुढ़ापा
Posted by hemjyotsana "Deep" on January 16, 2008
आँगन की तपती दोपहरी में ,
खाट के जैसे तपता सा
अपनो के चेहरो में ही ,
अपनो के चेहरो में ही ,
अपनो की राहें तकता सा |
चेहरे की झुर्री में
मुस्कान कहीं गुम हो जाती ,
तन्हाई में यादों की ,
तन्हाई में यादों की ,
बातें पुरानी रटता सा |
इस गली से उस मोड़ तक
नज़रे जा-जा कर आती ,
हाथ में लाठी ,बैठ बगीचे में ,
हाथ में लाठी ,बैठ बगीचे में ,
सुख-दुख के पंखे झलता सा |
अपने ही क़िस्सों की कहानी
बुन-बुन कर ,सबको सुनता ,
देख चुका जीवन के सब रंग ,
देख चुका जीवन के सब रंग ,
बन बैठा अब पतझड़ सा |
चकाचोंध से घर में दिवाली
होती है अक्सर अब तो ,
बेबसी में बेवजह ,बाम पे रखा ,
बेबसी में बेवजह ,बाम पे रखा ,
“दीप” कोई हैं जलता सा |
meri nanijee ko meri taraf se ye kavitaanjali
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