बिछुड़ ने की कोई रस्म नहीं होती
Posted by hemjyotsana "Deep" on December 3, 2007
तुझ से मिलने की ख़्वाहिश मेरी कभी कम नहीं होती
मेरे हाथों की लकीरों से , मेरी लड़ाई ख़त्म नही होती
यूँ तो रोशन है दिल का कौना कौना तुझसे ,
कभी तो आ , के तेरे बीन मेरे घर में रोशनी नहीं होती
तुझे तो मिलना है मुझ से मेरे साथ जीना है ,
ये अलग बात के ,खुदा से मेरी जंग ख़त्म नहीं होती ,
यहाँ के दरो-दीवार भी ख़फा रहते है मुझ से ,
ख़ुशबू-ओ -नज़रों की भी शिकायत कम नहीं होती ,
आ मेरे पास कभी यूँ गुन-गुनाता रहूँ तुझ को ,
मेरे ज़ुबान पर तेरी तारीफ़े , कभी ख़त्म नहीं होती
हम जो मिलेगे , ना बिछहड़ेगे कभी फिर से ,
मिलने के बाद , बिछुड़ ने की कोई रस्म नहीं होती ,
मैने ये कब कहा के तू मेरी साँसे धड़कन ज़िंदगी है ,
मगर तेरे बिन ये मेरी ज़िंदगी , ज़िंदगी नहीं होती
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