सच्ची दीपावली ….
Posted by hemjyotsana "Deep" on November 10, 2007
मुझे कपड़े दिलाना ये खिलाना वो खिलाना ,
यहाँ घुमाना वहाँ ले जाना या नई कोई फ़िल्म दिखाना ,
नहीं मुझे ऐसे दिवाली नहीं मनाना |
हॅसना गाना और थोड़े पैसे बचाना ,
उससे एक भुखे को खाना खिलाना ,
इस बार दिवाली को मुझे ऐसे ही है मनाना |
इस दिन अपने अवगुण ढूँढ ,
मुझे इन्हे है दूर भगाना |
अपनी ग़लतियों को मान , ना दोहराने की कसमें खाना |
अपने सपनो को पावन कर , उम्मीदों के दीप जलाना |
ऐसे ही रोशनी के पर्व को रोशन कर के है मुझे मनाना |
मेरे स्कूल के दिनों की एक कविता (1999)














mahendra mishra said
दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें
प्रेम पीयूष said
सरस शब्दों सें सच्ची दिवाली मनायी है तुमनें ।
शाय़द ऐसे ही किसी दीपोत्सव से ‘दीप’ का प्रार्दुभाव हूआ है ।
महावीर said
दीपावली पर प्रचलित ढर्रे पर लिखी हुईं कविताओं से अलग सरल-सुबोध भाषा में
एक नया दृष्टिकोण लेकर अच्छा प्रयास है। बधाई स्वीकारें।
विपिन चौहान"मन" said
वाह बहुत सुन्दर
बाल मन में ऐसे भाव का आना सहज नहीं होता
और क्युकी ये आप ने उस मासूम उम्र में लिखी है इसलिए और ज्यादा प्यारी लगी है
सुन्दर अभिव्यक्ति
बहुत बहुत बधाई
jagat said
वाह बहुत सुन्दर
बाल मन में ऐसे भाव का आना सहज नहीं होता
और क्युकी ये आप ने उस मासूम उम्र में लिखी है इसलिए और ज्यादा प्यारी लगी है
सुन्दर अभिव्यक्ति
बहुत बहुत बधाई
rakesh ranjan said
pata nahi kaise aapke ight pe aa gaya,kuchh kavitaein bhi padhee.aab jaaney ka dil hi nahi karta…
sacchi deepawali bahut achhi hai.