सच्ची दीपावली ….
Posted by hemjyotsana "Deep" on November 10, 2007
मुझे कपड़े दिलाना ये खिलाना वो खिलाना ,
यहाँ घुमाना वहाँ ले जाना या नई कोई फ़िल्म दिखाना ,
नहीं मुझे ऐसे दिवाली नहीं मनाना |
हॅसना गाना और थोड़े पैसे बचाना ,
उससे एक भुखे को खाना खिलाना ,
इस बार दिवाली को मुझे ऐसे ही है मनाना |
इस दिन अपने अवगुण ढूँढ ,
मुझे इन्हे है दूर भगाना |
अपनी ग़लतियों को मान , ना दोहराने की कसमें खाना |
अपने सपनो को पावन कर , उम्मीदों के दीप जलाना |
ऐसे ही रोशनी के पर्व को रोशन कर के है मुझे मनाना |
मेरे स्कूल के दिनों की एक कविता (1999)






November 10, 2007 at 10:43 am
दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें
November 12, 2007 at 10:44 am
सरस शब्दों सें सच्ची दिवाली मनायी है तुमनें ।
शाय़द ऐसे ही किसी दीपोत्सव से ‘दीप’ का प्रार्दुभाव हूआ है ।
November 14, 2007 at 5:50 am
दीपावली पर प्रचलित ढर्रे पर लिखी हुईं कविताओं से अलग सरल-सुबोध भाषा में
एक नया दृष्टिकोण लेकर अच्छा प्रयास है। बधाई स्वीकारें।
November 24, 2007 at 8:22 pm
वाह बहुत सुन्दर
बाल मन में ऐसे भाव का आना सहज नहीं होता
और क्युकी ये आप ने उस मासूम उम्र में लिखी है इसलिए और ज्यादा प्यारी लगी है
सुन्दर अभिव्यक्ति
बहुत बहुत बधाई
January 14, 2008 at 3:00 pm
वाह बहुत सुन्दर
बाल मन में ऐसे भाव का आना सहज नहीं होता
और क्युकी ये आप ने उस मासूम उम्र में लिखी है इसलिए और ज्यादा प्यारी लगी है
सुन्दर अभिव्यक्ति
बहुत बहुत बधाई