लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

Archive for October 17th, 2007

मेरी कविता बोली मुझसे..

Posted by hemjyotsana "Deep" on October 17, 2007

kavita

मेरी कविता बोली मुझसे ,
ओ-निर्माता मेरे ,मुझको ,
ये उम्मीद ना थी तुझसे ,

तुम जब मुझको नए नए शब्दों से सजा रहे थे,
मेरी गहराई कितनी है मुझ को ही बता रहे थे ,

अपने एह्सासो के बल पर ,  तुमने मुझको नए नए रुप दिये ,
सुन्दर सुन्दर स्वप्नों से अब तक ना जाने कितने स्वरुप दिये ,

माना निर्जीव को जान से ज्यादा जान दी तुमने ,
अभिमान से ज्यादा स्वाभिमान दिया तुमने ,

फिर क्युँ ऎसा करते हो  तुम ,
कई जख्म मुझे दें बैठॆ हो तुम ,

फिर भी अब तक खामोश रही ,
 लेकिन बस अब और नहीं ,

माफ किया आज भी तुमको ,
पर फिर ना ऎसा दोहराना ,

रखना मेरे स्वाभिमान का मान ,
कम ना करना अब मेरी जान ,

फिर से तमाशा महफिल में मुझे ना बनाना ,
जो ना समझें उन्हे नही  तुम मुझे सुनाना ,

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