कत्लें आम किया
Posted by hemjyotsana "Deep" on October 9, 2007
क्यूँ ज़ुबान छीनी मेरी , क्यूँ मुझे बेज़ुबान किया ।
मैंने कब तेरी बेवफ़ाई का चर्चा खुलेआम किया ।
ये माना के मैं निभा ना सका रस्म-ए-उल्फत ,
तुने भी कहाँ - कब , वफ़ा का कोई काम किया ।
इसी से बहल जायेगा दिल नादां ही तो है ,
तेरी गली में करके सज़दे हमने बहुत नाम किया ।
परदे में रखा है तेरा नाम साये को भी खबर नहीं ,
तुने ही बदनाम मुझे , बेवजह सर-ए-आम किया ।
सभी ने लगाये इल्ज़ाम मेरी बेगुनाई पर बहुत ,
कहा तुने भी, दीप ने परवानो का कत्लें आम किया ।






October 9, 2007 at 7:45 am
परदे में रखा है तेरा नाम साये को भी खबर नहीं,
तूने ही बदनाम मुझे, बेवजह सर-ए-आम किया।
…क्या बात है!!
October 9, 2007 at 8:00 pm
बहुत खूबसूरत पेशकश. अच्छा लगा पढ़कर. बधाई.
October 9, 2007 at 11:36 pm
हेम ज्योत्सना जी,
बहुत सुन्दर ग़ज़ल पेश की है आपने….. बधाई …लेकिन एक सुझाव है अन्यथा न लें…जरा वर्तनी पर ध्यान दें….वैसे लिखती बहुत अच्छा हो…ये पंक्तिया बहुत अच्छी लगीं…पुन: बधाई…
परदे में रखा है तेरा नाम साये को भी खबर नहीं ,
तुने ही बदनाम मुझे , बेवजह सर-ए-आम किया ।
डा. रमा द्विवेदी
October 20, 2007 at 10:36 pm
Hem
परदे में रखा है तेरा नाम साये को भी खबर नहीं ,
तुने ही बदनाम मुझे , बेवजह सर-ए-आम किया ।
Sunder vichaar, sunder abhivyakti.
Ramaji ki baat mein bhi dam hai.
Daad ke saath
Devi
November 25, 2007 at 3:24 am
hi hem
great lines
i m ranjeet writer as well , wt u written hats off to this kind og thinking keep writing and add value to the country growth
December 3, 2007 at 10:18 am
loved it
December 5, 2007 at 4:03 pm
good job! keep it up! i am also a software professional and a big fan of nice poetry!
December 20, 2007 at 4:01 pm
main bhi unhi lines ka kayal hua, jinki upper ek -do readers ne tarif ki hai.
Good